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Monday, 15 December 2025

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद: यूरोप में बंटवारा, अफ्रीका में उपनिवेशवाद का अंत?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद: यूरोप में बंटवारा, अफ्रीका में उपनिवेशवाद का अंत?
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद विश्व व्यवस्था ने एक नया रूप लिया। विजेता शक्तियों—अमेरिका और सोवियत संघ—ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र चुन लिए। यूरोप को आयरन कर्टन ने दो हिस्सों में बांट दिया: पश्चिमी यूरोप अमेरिकी प्रभाव में (नाटो के माध्यम से) और पूर्वी यूरोप सोवियत नियंत्रण में (वारसा पैक्ट)। लेकिन अफ्रीका और एशिया के उपनिवेशों के साथ कहानी अलग थी। यूरोपीय शक्तियां युद्ध से कमजोर हो चुकी थीं, और उन्होंने धीरे-धीरे अपने उपनिवेश छोड़ने शुरू कर दिए। क्या यह वास्तव में स्वतंत्रता थी, या महाशक्तियों की नई रणनीति? 

युद्ध ने यूरोपीय साम्राज्यों को आर्थिक और सैन्य रूप से तोड़ दिया। ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड और पुर्तगाल जैसे देश कर्ज में डूबे थे। मार्शल प्लान से अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप को बचाया, लेकिन उपनिवेशों को बनाए रखने की क्षमता खत्म हो गई। इसी दौरान उपनिवेशों में राष्ट्रवादी आंदोलन तेज हो गए। अफ्रीकी और एशियाई सैनिकों ने युद्ध में लड़ाई लड़ी थी और स्वतंत्रता की उम्मीद जगाई थी। 1945 से 1960 तक एशिया और अफ्रीका में तीन दर्जन से अधिक नए देश स्वतंत्र हुए। भारत 1947 में, इंडोनेशिया 1949 में, और 1960 को "अफ्रीका का वर्ष" कहा गया जब 17 देशों ने आजादी हासिल की। 
यूरोप में महाशक्तियां प्रत्यक्ष प्रभाव जमाती रहीं—सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप पर कब्जा रखा, जबकि अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप को आर्थिक-सैन्य सहायता दी। लेकिन अफ्रीका और एशिया में प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद खत्म हुआ। इसके पीछे कारण थे: यूरोपीय देशों की कमजोरी, संयुक्त राष्ट्र का दबाव, और कोल्ड वॉर की प्रतिस्पर्धा। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों उपनिवेशवाद-विरोधी दिखना चाहते थे ताकि नए देशों को अपने खेमे में ला सकें। अमेरिका ने यूरोपीय सहयोगियों पर दबाव डाला कि उपनिवेश छोड़ें, वरना कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ेगा। सोवियत संघ ने राष्ट्रवादी आंदोलनों को समर्थन दिया।

 फिर भी, स्वतंत्रता पूरी नहीं थी। नए देशों में महाशक्तियां अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती रहीं—आर्थिक सहायता, हथियार, या गुप्त हस्तक्षेप से। वियतनाम, अल्जीरिया और कांगो जैसे संघर्ष कोल्ड वॉर के प्रॉक्सी युद्ध बन गए। कई देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल हुए (बांडुंग सम्मेलन 1955), लेकिन ज्यादातर एक न एक खेमे में खिंचे। अफ्रीका में फ्रांस और ब्रिटेन ने कुछ आर्थिक नियंत्रण बनाए रखा, जैसे CFA फ्रैंक मुद्रा। 

आज देखें तो यह व्यवस्था नियोकोलोनियलिज्म की ओर इशारा करती है: प्रत्यक्ष कब्जे की जगह आर्थिक निर्भरता। यूरोप ने अपना "इलाका" खोया, लेकिन अफ्रीका और एशिया नई महाशक्तियों के प्रभाव में आए। क्या यह वास्तविक मुक्ति थी, या सिर्फ शासकों का बदलाव?
सज्जाद अली नायाणी ✍