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Saturday, 6 December 2025

अमेरिका में बंदूकें: स्वतंत्रता का हक़ या ख़ून की नदी?

अमेरिका में बंदूकें: स्वतंत्रता का हक़ या ख़ून की नदी?
अमेरिका – वो देश जो दुनिया को लोकतंत्र और आज़ादी का पाठ पढ़ाता है – आज खुद अपने ही घर में ख़ून से लथपथ है। साल 2024 तक 600 से ज़्यादा मास शूटिंग, हर रोज़ औसतन 120 लोग बंदूक़ों से मरते हैं, और स्कूलों में बच्चे डेस्क के नीचे छिपकर प्रार्थना करते हैं कि आज उनकी बारी न आए। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस ख़ौफ़नाक आँकड़ों के बावजूद अमेरिका अपनी “गन कल्चर” को छोड़ने को तैयार नहीं। सवाल ये है – ज़िम्मेवार कौन? 

 दूसरा संशोधन: 1791 का कानून, 2025 का क़त्लेआम

 अमेरिकी संविधान का दूसरा संशोधन (Second Amendment) कहता है कि लोगों को हथियार रखने और चलाने का हक़ है। वो दौर था जब देश नए-नए आज़ाद हुआ था, ब्रिटिश सेना से डर था और संगीन बंदूक़ें ही एकमात्र सुरक्षा थीं। आज वही संशोधन AR-15 जैसे असॉल्ट राइफ़ल्स को आम नागरिक के हाथ में थमा रहा है – वो हथियार जो सेना के लिए बनाए गए थे, स्कूल के बच्चों के लिए नहीं।

 NRA (National Rifle Association) और गन लॉबी हर बार यही रट लगाती है – “Guns don’t kill people, people kill people”। यानी बंदूक़ें नहीं, इंसान मारते हैं। लेकिन जब एक 18 साल का लड़का कानूनी तौर पर सेमी-ऑटोमैटिक राइफ़ल ख़रीदकर 19 मासूम बच्चों और 2 शिक्षकों को 10 मिनट में मार गिराता है (जैसा उवाल्डे में हुआ), तो ये बहाना कितना खोखला लगता है? 

आँकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं हक़ीक़त

 - अमेरिका में प्रति 1 लाख लोगों पर बंदूक़ से हत्या की दर: 4.12 

- जापान में: 0.02 - ब्रिटेन में: 0.06 

- ऑस्ट्रेलिया में 1996 के पोर्ट आर्थर नरसंहार के बाद सख़्त गन लॉज़ लाने के बाद मास शूटिंग लगभग ख़त्म। 

अमेरिका में कुल 400 मिलियन से ज़्यादा निजी बंदूक़ें हैं – यानी प्रति व्यक्ति 1.2 बंदूक़ें। दुनिया के 4% आबादी वाले देश के पास दुनिया की 40% निजी बंदूक़ें। 

“मेंटल हेल्थ” का बहाना हर मास शूटिंग के बाद रिपब्लिकन नेता और NRA कहते हैं – “समस्या बंदूक़ों की नहीं, मानसिक स्वास्थ्य की है।” लेकिन सच ये है कि मानसिक रोग हर देश में हैं, मगर कहीं और बच्चे एक-दूसरे को गोली नहीं मारते। क्यों? क्योंकि वहाँ हथियार इतनी आसानी से नहीं मिलते। 

 नतीजा: एक पीढ़ी जो डर में जी रही है अमेरिकी बच्चे आज “active shooter drill” करते हैं वैसे ही जैसे हम बचपन में आग से बचने की ड्रिल करते थे। उनके बैग में किताबों के साथ बुलेटप्रूफ़ इंसर्ट भी होता है। माँ-बाप स्कूल चुनते वक्त सबसे पहले पूछते हैं – “यहाँ कितनी बार शूटिंग हुई है?” 

 रास्ता है, इच्छाशक्ति नहीं ऑस्ट्रेलिया ने किया, न्यूज़ीलैंड ने किया, ब्रिटेन ने किया, जापान तो शुरू से कर रहा है। अमेरिका कर सकता है अगर चाहे। यूनिवर्सल बैकग्राउंड चेक, असॉल्ट वेपन्स बैन, रेड फ़्लैग लॉज़ – ये सब संभव हैं। लेकिन जब तक गन लॉबी के पैसे राजनीति को क़ाबू में रखें। 

अंत में एक ही सवाल बचता है – कितने और उवाल्डे, कितने और सैंडी हुक, कितने और लास वेगास चाहिए ये मानने के लिए कि “हथियार रखने का हक़” अब “जीने के हक़” पर भारी पड़ रहा है?
सज्जाद अली नायाणी✍️