फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच की धज्जियाँ? अमेरिकी यूनिवर्सिटी ने ईरानी मूल की असिस्टेंट प्रोफेसर शिरीन सईदी को पद से हटाया
अमेरिका, जो खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे बड़ा चैंपियन बताता है, वहाँ एक बार फिर इस दावे पर गंभीर सवाल उठे हैं। अर्कांसास यूनिवर्सिटी की मिडिल ईस्ट स्टडीज़ प्रोग्राम की निदेशक और पॉलिटिकल साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर **शिरीन सईदी** को उनके हालिया बयानों की वजह से पद से हटा दिया गया है। शिरीन, जो ईरानी-अमेरिकी मूल की हैं, पर आरोप है कि उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर की तारीफ की, इज़रायल की आलोचना की और यूनिवर्सिटी के ऑफिशियल लेटरहेड का इस्तेमाल करके एक ईरानी नागरिक की रिहाई की अपील की।
यह घटना दिसंबर 2025 की है, जब यूनिवर्सिटी ने शुक्रवार को उन्हें मिडिल ईस्ट स्टडीज़ प्रोग्राम के डायरेक्टर पद से हटा दिया। यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता ने न्यूयॉर्क पोस्ट को बताया कि शिरीन अभी भी पॉलिटिकल साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हैं, लेकिन उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी छीन ली गई है। जांच जारी है, खासकर लेटरहेड के दुरुपयोग को लेकर।
शिरीन सईदी के बयान क्या थे जो इतने विवादास्पद साबित हुए? रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक प्लेटफॉर्म्स पर ईरान के समर्थन में पोस्ट किए, इज़रायल की नीतियों की कड़ी आलोचना की और यहां तक कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की प्रशंसा की। इसके अलावा, उन्होंने स्वीडन में कैद पूर्व ईरानी अधिकारी हामिद नूरी की रिहाई के लिए यूनिवर्सिटी के लेटरहेड पर अपील लिखी, जिसे संस्थान ने संसाधनों के दुरुपयोग के रूप में देखा।
इस मामले में दबाव बनाने वालों में अमेरिकी राजनेता और इज़रायल समर्थक ग्रुप शामिल हैं। अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने शिरीन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ऐसे बयान देने वाली प्रोफेसर को तेहरान भेज देना चाहिए, जहां वे "नफरत से भरी शिक्षा" दे सकें। ईरान विरोधी ग्रुप जैसे एलायंस अगेंस्ट इस्लामिक रिजीम ऑफ़ ईरान अपोलॉजिस्ट्स (AAIRIA) ने भी यूनिवर्सिटी पर दबाव डाला।
यह घटना अमेरिका में अकादमिक फ्रीडम पर बहस को फिर से गरमा रही है। एक तरफ इज़रायल और अमेरिकी हितों की रक्षा का तर्क है, तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल। ईरानी मीडिया और मानवाधिकार समर्थक इसे अमेरिका की पाखंडपूर्ण नीति का उदाहरण बता रहे हैं – जहां फिलिस्तीन या ईरान के समर्थन में बोलना महंगा पड़ जाता है, जबकि अन्य विचारों को बढ़ावा मिलता है।
पिछले सालों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां गाज़ा या इज़रायल की आलोचना करने वाले प्रोफेसरों को निलंबित या बर्खास्त किया गया। क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी की असली तस्वीर है? यह सवाल अमेरिकी विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता पर बड़ा चिंतन बिंदु बन रहा है।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼