गुजरात को विकास का मॉडल कहा जाता है, जहां स्वास्थ्य और पोषण के लिए सरकार सालों से करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। बाल सखा योजना, जननी सुरक्षा योजना और कुपोषण मुक्त गुजरात जैसी कई योजनाएं चल रही हैं। फिर भी, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर अंडर-5 मॉर्टेलिटी रेट कई अन्य राज्यों की तुलना में ऊंची बनी हुई है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में यह दर **24 प्रति हजार** है, जबकि **केरल में सिर्फ 8**, तमिलनाडु में **14** और महाराष्ट्र में **16** है। ### अन्य राज्यों से तुलना - **केरल**: 8 प्रति हजार - **तमिलनाडु**: 14 प्रति हजार - **दिल्ली**: 14 प्रति हजार - **जम्मू-कश्मीर**: 16 प्रति हजार - **महाराष्ट्र**: 16 प्रति हजार - **पश्चिम बंगाल**: 20 प्रति हजार - **कर्नाटक**: 21 प्रति हजार - **गुजरात**: 24 प्रति हजार
ये आंकड़े सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) पर आधारित हैं। गुजरात ने SDG का लक्ष्य (2030 तक 25 से नीचे) हासिल कर लिया है, लेकिन केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों से अभी पीछे है।
कुपोषण और योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल राज्य में कुपोषण खत्म करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। गर्भवती माताओं को पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएं दी जा रही हैं। फिर भी, दूर-दराज के इलाकों तक फायदा पहुंचता नहीं दिख रहा। कई बार योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती हैं या बीच में ही फायदा उठा लिया जाता है। नतीजा यह है कि हजारों नवजात आज भी अस्पतालों में आखिरी सांस ले रहे हैं।
सरकारी योजनाएं नाकाम? गुजरात में कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन उनका असर उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल रहा। अन्य राज्यों ने इस क्षेत्र में बेहतर नियंत्रण हासिल किया है। स्वास्थ्य क्षेत्र में तेज प्रगति के बावजूद गुजरात को इस मामले में सफलता नहीं मिली है। जरूरत है कि योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जाए और पारदर्शिता बढ़ाई जाए, ताकि हर बच्चे का जीवन बच सके।
सज्जाद अली नायाणी ✍