इस बार इस खेल का हीरो हैं हुमायूं कबीर। कल तक अलग रंग, अलग झंडे के साथ मैदान में थे। 2019 में लोकसभा का चुनाव लड़ा। उस दिन भी खुले दिल से उसी खेमे में खड़े नजर आए।
फिर अचानक पाला बदला, विधायक बन गए। और अब 2026 से पहले नया ड्रामा – 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का शिलान्यास और असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन का ऐलान! सवाल एक ही है
– जिंदगी में कभी एक मस्जिद या मदरसा नहीं बनवाया, अचानक बाबरी मस्जिद की याद कैसे आ गई?
इस्लाम में मस्जिद सिर्फ अल्लाह की इबादत के लिए बनती है, जहाँ जरा सा भी विवाद न हो।
लेकिन हुमायूं कबीर साहब मस्जिद को चुनावी हथियार बना रहे हैं। 6 दिसंबर को शिलान्यास? ये धार्मिक भावना नहीं, शुद्ध वोट की राजनीति है। मुस्लिम समाज को बाँटने के लिए ऐसे मौकापरस्त लोग हर चुनाव से पहले पैदा होते हैं।
कल जिस खेमे में थे, वहाँ पर ताली बजा रहे थे। आज उसी समाज के वोट काटने के लिए बाबरी मस्जिद का ढोंग कर रहे हैं। हुमायूं कबीर कोई धार्मिक नेता नहीं, कोई समाजसेवी नहीं, बस एक प्रोफेशनल “वोट-कटवा” हैं।
जो आज यहाँ हैं, कल वहाँ होंगे, पर मकसद एक ही – वोट बिखेर दो, किसी एकजुट धारा को कमजोर कर दो। हर समाज अब इन “वोट-कटवा एजेंटों” को अच्छी तरह पहचानने लगा है। जो कल चुप था, आज बाबरी का ढोंग कर रहा है
– ऐसा व्यक्ति किसी का हितैषी है, न बंगाल का। ये सिर्फ एक चुनावी हथियार है। जिसे इस्तेमाल करने के बाद फिर फेंक दिया जाएगा।
✍️ सज्जाद अली नायाणी