भारत में नाम बदलने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। लखनऊ का राजभवन अब ‘लोक भवन’ कहलाएगा। दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास का नया नाम रखा गया है – ‘सेवा तीर्थ’। सुनने में बहुत पवित्र लगता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही बयान करती है।
‘लोक भवन’ नाम सुनकर लगता है कि अब जनता के दरवाज़े खुल जाएँगे। पर सच यह है कि आम आदमी आज भी राजभवन के मुख्य गेट से सैकड़ों मीटर दूर ही रुक जाता है। सुरक्षा घेरा, बैरिकेड्स और वीवीआईपी कल्चर आज भी वैसा का वैसा है। नाम बदल गया, लोक से दूरी नहीं बदली।
और ‘सेवा तीर्थ’? जिस किसान की सेवा का दावा किया जाता है, उसी किसान को पिछले पाँच साल से दिल्ली की सीमाओं पर रोक दिया जाता है। ट्रैक्टर रैली पर गोली चलती है, आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं, इंटरनेट बंद कर दिया जाता है। वो किसान जो अपनी फ़सल का सही दाम माँगने दिल्ली आना चाहता था, उसे राजधानी में घुसने नहीं दिया गया। यही है ‘सेवा तीर्थ’ की सेवा?
दिल्ली में प्रदूषण पिछले कई सालों से विश्व रिकॉर्ड तोड़ रहा है। हर नवंबर-दिसंबर में लोग ऑक्सीजन के लिए तरसते हैं। जिस दिल्ली से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत हुई थी, उसी दिल्ली में आज भी यमुना नाले में तब्दील है, कचरे के पहाड़ खड़े हैं और अवैध कंस्ट्रक्शन से हवा जहरीली बनी हुई है। पर नाम बदलने का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है।
हाल ही में दिल्ली के प्राचीन हनुमान मंदिर – जो करीब 1400 साल पुराना था – को महज़ इसलिए तोड़ दिया गया क्योंकि ‘केशव भवन’ के नीचे पार्किंग की जगह चाहिए थी। एक तरफ़ प्राचीन धरोहर को मिट्टी में मिलाया जा रहा है, दूसरी तरफ़ नए-नए नामों से इमारतों को चमकाया जा रहा है।
नाम बदलने से न प्रदूषण कम होता है, न बेरोज़गारी ख़त्म होती है, न किसान की आत्महत्या रुकती है और न ही आम आदमी को न्याय आसानी से मिलता है। नाम बदलना आसान है, हक़ीक़त बदलना मुश्किल। जनता अब पूछ रही है – ये नाम बदलकर आख़िर किसे खुश किया जा रहा है? जनता को या सिर्फ़ फोटो-ऑप्स को?
सेवा तीर्थ में अगर सचमुच सेवा होती, तो दिल्ली की सीमा पर बैठे किसान को ठंड में मरने नहीं दिया जाता। लोक भवन वाक़ई लोक का होता, तो वहाँ आम आदमी बिना अपॉइंटमेंट के अपनी फ़रियाद लेकर पहुँच पाता।
नाम बदलो या न बदलो, जनता की आँखें अब खुल चुकी हैं। वो जानती है – सिर्फ़ शब्दों से स्वच्छ भारत नहीं बनता, ज़रूरत है इरादों की स्वच्छता की।
सज्जाद अली नायाणी✍️