नई दिल्ली: अब वो दिन दूर नहीं जब धर्म बदलकर ईसाई या मुस्लिम बनने के बाद भी अनुसूचित जाति (SC) का आरक्षण का लाभ उठाने वालों की शामत आने वाली है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने पूरे देश में बड़ा अभियान शुरू करने का फैसला किया है।
इस अभियान के तहत उन सभी लोगों की तलाश की जाएगी जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया, फिर भी SC कोटे में नौकरी, दाखिला या अन्य लाभ ले रखे हैं।
लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है: जब धर्म बदलने वाला SC व्यक्ति आरक्षण खो देता है, तो पूरा-पूरा समाज एक साथ OBC में डालकर आरक्षण दे देना क्या संविधान का उल्लंघन नहीं है?
संविधान की धारा-341 और 1950 के राष्ट्रपति आदेश के अनुसार केवल हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले अनुसूचित जाति के लोग ही आरक्षण के हकदार हैं। ईसाई या मुस्लिम बन चुका व्यक्ति इस लाभ से वंचित हो जाता है। फिर भी देश के कई राज्यों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि लोग धर्म बदलने के बाद भी पुराना जाति प्रमाण-पत्र इस्तेमाल कर रहे हैं।
NCSC ने सभी राज्य सरकारों को पत्र लिखकर सख्त निर्देश दिए हैं: - सभी सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों व संस्थानों में SC श्रेणी से आई हर व्यक्ति के जाति एवं धर्म के दस्तावेजों की दोबारा जांच हो। - धर्मांतरण पाए जाने पर तुरंत आरक्षण लाभ वापस लिया जाए और कानूनी कार्रवाई की जाए।
यह कदम इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले और 2024 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था – “केवल आरक्षण लाभ के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है।”
लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है: जब धर्म बदलने वाला SC व्यक्ति आरक्षण खो देता है, तो पूरा-पूरा समाज एक साथ OBC में डालकर आरक्षण दे देना क्या संविधान का उल्लंघन नहीं है?
क्या यह भी “सामाजिक न्याय” के नाम पर संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं? इस अभियान से हजारों नौकरियां और दाखिले रद्द होने की संभावना है। फर्जी प्रमाण-पत्र पर लाभ लेने वालों के खिलाफ FIR और पैसों की वसूली भी होगी।
आने वाले कुछ महीनों में देश की आरक्षण व्यवस्था में बड़ा “शुद्धिकरण” देखने को मिलेगा। पर सवाल वही रह जाता है – आरक्षण के नाम पर चल रहा यह राजनीतिक खेल कब खत्म होगा?
सज्जाद अली नायाणी ✍