F-riday World January 14,2026
14 जनवरी का दिन विश्व इतिहास में दो बेहद महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाता है। एक तरफ 1641 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) ने मलक्का (आज का मलेशिया) पर कब्जा कर यूरोपीय साम्राज्यवाद के एक नए अध्याय की शुरुआत की, तो दूसरी तरफ 1784 में अमेरिकी कांग्रेस ने **पेरिस संधि** को मंजूरी देकर अमेरिकी क्रांति को आधिकारिक रूप से समाप्त किया और संयुक्त राज्य अमेरिका को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। ये दोनों घटनाएँ दूर-दूर तक फैले साम्राज्यवाद, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और स्वतंत्रता की लड़ाई की जीवंत मिसाल हैं।
1641: मलक्का पर डच कब्जा – मसालों के साम्राज्य की नई शुरुआत
17वीं शताब्दी की शुरुआत में यूरोपीय शक्तियाँ एशिया के मसाला व्यापार पर कब्जा करने के लिए आपस में होड़ में लगी हुई थीं। पुर्तगालियों ने 1511 में मलक्का पर कब्जा कर इसे एक मजबूत किला और व्यापारिक केंद्र बना लिया था। मलक्का स्ट्रेट ऑफ मलक्का के मुहाने पर स्थित था, जो भारत, चीन, इंडोनेशिया और यूरोप के बीच मसालों (लौंग, जायफल, काली मिर्च) के व्यापार का मुख्य रास्ता था।
डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC), जो उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली व्यापारिक कंपनी थी, ने पुर्तगालियों की इस एकाधिकार को तोड़ने का फैसला किया। कई सालों की छोटी-मोटी झड़पों और नाकाबंदी के बाद, 3 अगस्त 1640 को डच सेना ने मलक्का की घेराबंदी शुरू की।
इस घेराबंदी में डच सेना के साथ उनके स्थानीय सहयोगी – जोहोर सल्तनत के सैनिक (लगभग 500-600) और जावानीज योद्धा शामिल थे। कुल मिलाकर डच पक्ष की ताकत करीब 700-1200 सैनिकों की थी। दूसरी ओर पुर्तगाली गवर्नर मैनुएल डे सौसा कोउटिन्हो के पास मजबूत किला था, लेकिन भोजन, गोला-बारूद और सैनिकों की कमी ने उन्हें कमजोर कर दिया।
लंबी नाकाबंदी के दौरान शहर में भयानक अकाल पड़ गया। लोग बिल्लियाँ, चूहे और यहां तक कि मृत शरीरों को खाने पर मजबूर हो गए। बीमारियाँ फैलीं और हजारों लोग मारे गए। आखिरकार, 14 जनवरी 1641 को डच सेना ने शहर पर अंतिम हमला किया और पुर्तगालियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
इस जीत के साथ डचों ने न केवल मसाला व्यापार पर अपना नियंत्रण मजबूत किया, बल्कि एशिया में पुर्तगाली प्रभाव को काफी हद तक कमजोर कर दिया। मलक्का अगले 183 साल (1641-1825, कुछ ब्रिटिश अंतराल के साथ) डच नियंत्रण में रहा। इस घटना ने दिखाया कि कैसे व्यापारिक कंपनियाँ सैन्य शक्ति बनकर पूरे महाद्वीपों पर हावी हो सकती हैं।
1784: पेरिस संधि की मंजूरी– अमेरिकी क्रांति का आधिकारिक अंत अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-1783) ने दुनिया को एक नया लोकतंत्र दिया। यॉर्कटाउन की निर्णायक जीत (1781) के बाद ब्रिटेन समझ गया कि उपनिवेशों को रोकना असंभव है। 3 सितंबर 1783 को पेरिस में ट्रीटी ऑफ पेरिस पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें ब्रिटेन ने अमेरिका की स्वतंत्रता को मान्यता दी।
लेकिन संधि को आधिकारिक रूप से लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस (कांग्रेस ऑफ द कॉन्फेडरेशन) की मंजूरी जरूरी थी। ठंडी सर्दी, यात्रा की कठिनाइयों और राज्यों के प्रतिनिधियों की कमी के कारण यह प्रक्रिया लंबी खिंची।
आखिरकार, 14 जनवरी 1784 को एनापोलिस, मैरीलैंड के मैरीलैंड स्टेट हाउस में कांग्रेस ने संधि को बिना किसी विरोध के मंजूरी दी। इस संधि के मुख्य बिंदु थे:
- ब्रिटेन ने 13 अमेरिकी उपनिवेशों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी।
- अमेरिका की सीमाएँ मिसिसिपी नदी तक निर्धारित की गईं।
- न्यूफाउंडलैंड की मछली पकड़ने की सुविधा अमेरिकियों को मिली।
- दोनों पक्षों के कर्ज चुकाने थे और ब्रिटिश वफादारों (लॉयलिस्ट) की संपत्ति पर विचार करने की सिफारिश की गई।
यह रैटिफिकेशन अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था – अब वह न केवल युद्ध में जीता, बल्कि कानूनी रूप से भी एक स्वतंत्र देश बन गया। इसने दुनिया को दिखाया कि उपनिवेशों से स्वतंत्रता संभव है और लोकतंत्र की नींव मजबूत हो सकती है।
: इतिहास की दो विपरीत धाराएँ 14 जनवरी हमें दो
अलग-अलग कहानियाँ सुनाता है – एक जहां यूरोपीय शक्तियाँ एशिया पर कब्जा कर रही थीं और व्यापारिक साम्राज्यवाद चरम पर था, तो दूसरी जहां एक नया राष्ट्र जन्म ले रहा था जो उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा हुआ।
1641 का मलक्का कब्जा साम्राज्यवाद की ताकत दिखाता है, जबकि 1784 की पेरिस संधि स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की जीत का प्रतीक है। ये घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास सिर्फ तारीखों का संग्रह नहीं, बल्कि शक्ति, संघर्ष और परिवर्तन की जीवंत गाथा है।
आज के दौर में जब हम वैश्विक संबंधों और स्वतंत्रता की बात करते हैं, ये दोनों घटनाएँ हमें गहराई से सोचने पर मजबूर करती हैं।
14 जनवरी – एक दिन जो साम्राज्यवाद और स्वतंत्रता, दोनों की याद दिलाता है!-🌍
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 14,2026