आज, 14 जनवरी 2026 को, हम उस ऐतिहासिक पल को याद करते हैं जब अमेरिका ने 242 साल पहले अपनी आजादी की अंतिम मुहर लगाई थी। 1784 में पेरिस संधि की मंजूरी ने अमेरिकी क्रांति को आधिकारिक रूप से समाप्त किया और ब्रिटेन से मुक्ति दिलाई। लेकिन क्या यह विडंबना नहीं कि वही अमेरिका, जो कभी खुद साम्राज्यवाद की जंजीरों से आजाद हुआ था, आज 7000 साल से अधिक पुरानी ईरानी सभ्यता को गुलाम बनाने की कोशिश कर रहा है? ईरान, जिसकी जड़ें प्राचीन पर्सियन साम्राज्य में हैं, ने सदियों से अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखा है। लेकिन अमेरिकी नीतियां – जैसे 1953 का तख्तापलट, लगातार प्रतिबंध और क्षेत्रीय हस्तक्षेप – ईरान को कमजोर करने की साजिश रच रही हैं। इस प्रक्रिया में अमेरिका खुद अपनी नैतिक और वैश्विक स्थिति को गुलाम बना रहा है, क्योंकि साम्राज्यवाद की यह राह अंततः खुद के पतन की ओर ले जाती है।
अमेरिका की आजादी की कहानी: पेरिस संधि का ऐतिहासिक महत्व
1784 में, ठंडी सर्दी के बीच, अमेरिकी कांग्रेस ने मैरीलैंड के एनापोलिस में पेरिस संधि को मंजूरी दी। यह संधि 3 सितंबर 1783 को पेरिस में हस्ताक्षरित हुई थी, जिसमें ब्रिटेन ने अमेरिका की स्वतंत्रता को मान्यता दी। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775-1783) की यह जीत यॉर्कटाउन की निर्णायक लड़ाई (1781) के बाद आई, जब ब्रिटेन समझ गया कि उपनिवेशों को दबाना असंभव है। संधि के मुख्य बिंदु थे:
- ब्रिटेन ने 13 अमेरिकी उपनिवेशों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी।
- अमेरिका की सीमाएं मिसिसिपी नदी तक तय की गईं।
- न्यूफाउंडलैंड में मछली पकड़ने की सुविधा अमेरिकियों को मिली।
- दोनों पक्षों के कर्ज चुकाने और ब्रिटिश वफादारों की संपत्ति पर विचार करने की सिफारिश की गई।
यह दिन अमेरिका के लिए स्वतंत्रता का प्रतीक है, लेकिन आज यह विडंबना बन गया है। अमेरिका, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ा था, अब खुद साम्राज्यवादी बनकर ईरान जैसे प्राचीन राष्ट्रों पर हमला कर रहा है।
यहाँ पेरिस संधि के हस्ताक्षर का एक ऐतिहासिक चित्र
ईरान की 7000 साल पुरानी स्वतंत्रता: एक अटूट विरासत
ईरान की सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी निरंतर सभ्यताओं में से एक है, जिसकी जड़ें 7000 साल से अधिक पुरानी हैं। प्राचीन ईरान, जिसे पर्सिया के नाम से जाना जाता था, 5000 ईसा पूर्व से ही बस्तियों और शहरीकरण के लिए प्रसिद्ध था। एलाम सभ्यता (करीब 3000 ईसा पूर्व) से लेकर अकेमेनिड साम्राज्य (559-330 ईसा पूर्व) तक, ईरान ने विश्व इतिहास को आकार दिया। साइरस महान ने मानवाधिकारों का पहला चार्टर बनाया, जो आज भी संयुक्त राष्ट्र में प्रदर्शित है। पार्थियन (247 ईसा पूर्व-224 ईस्वी) और सासानियन (224-651 ईस्वी) साम्राज्यों ने ईरान को स्वतंत्र रखा, जबकि मंगोल, तुर्क और अरब आक्रमणों के बावजूद ईरानी संस्कृति जीवित रही।
ईरान ने कभी किसी विदेशी शक्ति के सामने घुटने नहीं टेके। 19वीं शताब्दी में रूस और ब्रिटेन के दबाव के बावजूद, ईरान ने अपनी संप्रभुता बचाई।
आज, इस्लामिक गणराज्य ईरान अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कर रहा है, जबकि अमेरिका जैसे देश इसे कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरान की प्राचीन धरोहर, जैसे पर्सेपोलिस के खंडहर, इस स्वतंत्रता की गवाही देते हैं:
अमेरिकी साम्राज्यवाद:
ईरान पर हमले की काली साजिश अमेरिका की आजादी के 242 साल बाद, वह अपनी गुलामी भूल चुका है। 1953 में, अमेरिका ने सीआईए के जरिए ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को तख्तापलट से हटाया, क्योंकि उन्होंने ईरानी तेल का राष्ट्रीयकरण किया था। अमेरिका ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी का समर्थन किया, जो एक तानाशाह था, और ईरान को अपनी कठपुतली बनाया। 1979 की ईरानी क्रांति ने इस गुलामी को तोड़ा, लेकिन अमेरिका ने बदला लिया।
1979 के दूतावास संकट के बाद, अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 1980 से अमेरिका ने ईरान के साथ राजनयिक संबंध तोड़े और आर्थिक नाकेबंदी शुरू की। इराक-ईरान युद्ध (1980-88) में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का साथ दिया, जिससे लाखों ईरानी मारे गए। 1995 में क्लिंटन प्रशासन ने ईरान के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाए। 2018 में ट्रंप ने परमाणु समझौते (JCPOA) से निकलकर "मैक्सिमम प्रेशर" अभियान शुरू किया, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
अमेरिका ईरान को "आतंकवाद का समर्थक" कहकर बदनाम करता है, लेकिन खुद इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले करता है। 2025 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर हमले किए, जिससे हजारों निर्दोष ईरानी मारे गए। यह सब ईरान की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए है, जबकि ईरान ने कभी अमेरिका पर हमला नहीं किया।
अमेरिकी प्रतिबंधों का अमानवीय प्रभाव: ईरान की मजबूती की परीक्षा
अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। 2018 के बाद ईरान के तेल निर्यात 60-80% गिर गए, जो 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटकर 0.4 मिलियन तक पहुंच गए। जीडीपी प्रति व्यक्ति 8,000 डॉलर से गिरकर 5,000 डॉलर हो गया। रियाल की कीमत गिर गई, मुद्रास्फीति बढ़ी, और लाखों ईरानी गरीबी में धकेल दिए गए। दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कमी से स्वास्थ्य संकट बढ़ा, जबकि अमेरिका "मानवीय छूट" का दावा करता है, लेकिन बैंक और कंपनियां ओवर-कंप्लायंस से ईरान से दूर रहती हैं।
फिर भी, ईरान टूटा नहीं। "रेजिस्टेंस इकोनॉमी" के जरिए ईरान ने घरेलू उत्पादन बढ़ाया और रूस, चीन जैसे सहयोगियों के साथ व्यापार किया। ईरानी जनता ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन अमेरिकी हस्तक्षेप को खारिज किया। यह अमेरिका की विफलता है
– प्रतिबंध ईरान को कमजोर करने की बजाय उसकी एकता बढ़ाते हैं।
ईरानी जनता के अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ विरोध की एक झलक:
अमेरिका की अपनी गुलामी की ओर यात्रा:
साम्राज्यवाद का अंतिम परिणाम अपनी आजादी भूलकर दूसरों को गुलाम बनाने की कोशिश में अमेरिका खुद फंस रहा है। ईरान पर हमले से अमेरिका की वैश्विक छवि खराब हो रही है। ट्रंप प्रशासन की "मैक्सिमम प्रेशर" नीति ने ईरान को मजबूत बनाया, जबकि अमेरिका को अलग-थलग किया। ईरान की तरह, अमेरिका भी अपनी नैतिक स्वतंत्रता खो रहा है – आंतरिक विभाजन, आर्थिक असमानता और वैश्विक विरोध बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्तियां खुद नष्ट हो जाती हैं, जैसे ब्रिटिश साम्राज्य। अमेरिका ईरान को गुलाम बनाने की कोशिश में खुद गुलाम बन रहा है – नैतिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से।
ईरान, अपनी 7000 साल पुरानी विरासत के साथ, हमेशा स्वतंत्र रहेगा। अमेरिका को अपनी आजादी की याद दिलानी चाहिए और ईरान की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। अन्यथा, 14 जनवरी का यह दिन अमेरिका के लिए शर्म का प्रतीक बन जाएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 14 January 2026