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Monday, 19 January 2026

ईरान ने अमेरिका को 444 दिनों तक घुटनों पर ला दिया: तेहरान दूतावास पर कब्जा और अमेरिकी जासूसों की बंधकता की सनसनीखेज कहानी!

ईरान ने अमेरिका को 444 दिनों तक घुटनों पर ला दिया: तेहरान दूतावास पर कब्जा और अमेरिकी जासूसों की बंधकता की सनसनीखेज कहानी!
-Friday World-January 19, 202
4 नवंबर 1979 का वो दिन इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, जब ईरान की राजधानी तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर इस्लामिक क्रांतिकारी छात्रों ने धावा बोल दिया। ये सिर्फ एक हमला नहीं था—ये अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ ईरान की नई इस्लामिक क्रांति का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। छात्रों ने दूतावास पर कब्जा कर लिया और 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया, जिनमें से 52 को 444 दिनों तक कैद रखा गया। अमेरिका को झुकना पड़ा, और दुनिया ने देखा कि एक छोटा देश कैसे महाशक्ति को चुनौती दे सकता है। 



शाह का पलायन और अमेरिका का समर्थन ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से बेदखल कर दिया। शाह, जो अमेरिका का करीबी सहयोगी था, क्रांति के बाद देश छोड़कर भाग गया। अक्टूबर 1979 में अमेरिका ने शाह को कैंसर के इलाज के लिए अपने देश में प्रवेश की अनुमति दी। ईरानी जनता के लिए ये फैसला आग में घी डालने जैसा था। वे मानते थे कि अमेरिका ने शाह को बचाया और ईरान के खिलाफ साजिश रची।

 आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में नई इस्लामिक सरकार ने अमेरिका को "महान शैतान" करार दिया। छात्रों का एक समूह, जिसे "इमाम की लाइन के मुस्लिम छात्र अनुयायी" कहा जाता था, ने दूतावास पर हमला करने का फैसला किया। उनका मुख्य मांग था—शाह को ईरान प्रत्यर्पित करो, ताकि उन पर मुकदमा चलाया जा सके और अमेरिका ईरान के आंतरिक मामलों में दखल न दे। 

हमले का दिन: 4 नवंबर 1979 सुबह के वक्त हजारों प्रदर्शनकारी दूतावास के बाहर जमा थे। अचानक छात्रों ने दीवार फांदकर अंदर घुस गए। अमेरिकी मरीन गार्ड्स ने विरोध किया, लेकिन वे जल्दी ही हथियार डालने को मजबूर हो गए। कुल 66 लोग बंधक बने—ज्यादातर राजनयिक, कर्मचारी और कुछ नागरिक।

 छात्रों ने दूतावास को कब्जे में ले लिया और बंधकों को अंधेरे कमरों में बंद कर दिया। कई बंधकों को आंखों पर पट्टी बांधकर बाहर लाया गया, जहां भीड़ ने "अमेरिका मुर्दाबाद" के नारे लगाए। ईरानी टेलीविजन ने लाइव प्रसारण किया, जिससे पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई। 
(अंधेरे में बंधे अमेरिकी बंधक, जिनकी आंखों पर पट्टी बंधी है—ये तस्वीर दुनिया भर में सुर्खियां बनी) 

ईरानी सरकार और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका हमले के समय ईरानी पुलिस और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने छात्रों को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि आयतुल्लाह खुमैनी ने छात्रों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ये कार्रवाई ईरानी जनता की भावनाओं का प्रतिबिंब है। कुछ दिनों बाद 13 महिलाओं और अफ्रीकी-अमेरिकियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन बाकी 52 बंधकों को 444 दिनों तक कैद रखा गया।

अमेरिका की प्रतिक्रिया और असफल बचाव अभियान जिमी कार्टर प्रशासन ने कूटनीति और आर्थिक प्रतिबंध लगाए। ईरानी संपत्तियां अमेरिका में फ्रीज कर दी गईं। अप्रैल 1980 में "ऑपरेशन ईगल क्लॉ" नाम से एक सैन्य बचाव अभियान चलाया गया, लेकिन वो पूरी तरह असफल रहा—8 अमेरिकी सैनिक मारे गए और कोई बंधक नहीं छुड़ाया जा सका।

 ये संकट कार्टर की लोकप्रियता को भारी नुकसान पहुंचाया और 1980 के चुनाव में उनकी हार का एक बड़ा कारण बना। 

444 दिनों के बाद अंत और आज की विरासत 20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति पद की शपथ के ठीक मिनटों बाद बंधकों को रिहा कर दिया गया। अल्जीरिया के मध्यस्थता से अल्जियर्स समझौता हुआ, जिसमें अमेरिका ने ईरानी संपत्तियां वापस कीं और प्रतिबंध हटाए।

 ये घटना अमेरिका-ईरान संबंधों में स्थायी दरार पैदा कर गई। ईरान में इसे "दूसरा क्रांति" कहा जाता है, जबकि अमेरिका में ये एक राष्ट्रीय अपमान के रूप में याद किया जाता है।

 आज भी तेहरान का पूर्व अमेरिकी दूतावास एक संग्रहालय है, जहां "जासूसी का घोंसला" लिखा बोर्ड लगा है। ये घटना साबित करती है कि जब कोई देश अपनी संप्रभुता और सम्मान के लिए खड़ा होता है, तो महाशक्तियां भी झुक सकती हैं।

 ईरान ने दिखाया—अमेरिका अजेय नहीं है! 

Sajjadali Nayani ✍
Friday World-January 19, 2026