भारत के इतिहास में एक ऐसा नाम है जो त्याग, प्रजाभक्ति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में अमर हो गया है –
महाराजा श्री कृष्णकुमारसिंहजी गोहिल। भावनगर रियासत के अंतिम शासक ने अपने जीवन के मंत्र को साकार किया: "मेरी प्रजा का कल्याण हो"। इस सूत्र को उन्होंने केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी पूरा करके दिखाया। आजादी के बाद के नाजुक दौर में, जब 565 रियासतों का भारतीय संघ में विलय एक बड़ी चुनौती थी, तब सबसे पहले भावनगर के महाराजा ने अपना राज्य भारत को अर्पित कर दिया। इस महान त्याग की याद में हम आज त्याग दिवस के रूप में 15 जनवरी मनाते हैं।
महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी का जन्म 19 मई 1912 को भावनगर में हुआ था। मात्र 7 वर्ष की छोटी उम्र में 1919 में वे गद्दी पर बैठे। 1931 में पूर्ण वयस्क होने पर उन्होंने पूरा शासन संभाला और 1948 तक भावनगर को एक अद्भुत प्रगतिशील राज्य बनाया। वे महात्मा गांधीजी के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। गांधीजी से मिलने पर उनके हृदय में राष्ट्रभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित हुई।
आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के एकीकरण अभियान में कई रियासतें विरोध कर रही थीं। ऐसे समय में महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी ने निर्णय लिया कि भारत की एकता और अखंडता सबसे ऊपर है। 17 दिसंबर 1947 को वे दिल्ली में गांधीजी से मिले और अपने राज्य को भारत में मिलाने की इच्छा व्यक्त की। गांधीजी ने इस कदम का स्वागत किया और सरदार पटेल से मिलने की सलाह दी।
आखिरकार 15 जनवरी 1948 को भावनगर में एक ऐतिहासिक समारोह में महाराजा ने सरदार पटेल के हाथों अपना राज्य भारतीय संघ को सौंप दिया। उन्होंने कहा, "भारत के एकीकरण में शामिल होना ही भावनगर की प्रजा और विरासत के हित में है।" इस त्याग ने अन्य रियासतों को भी प्रेरित किया और भारत के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।
लेकिन महाराजा केवल राज्य अर्पण करके नहीं रुके। उनके शासनकाल में प्रजा कल्याण के अनेक कार्य हुए:
- शिक्षा, स्वास्थ्य और सहकारी आंदोलन को प्रोत्साहन दिया।
- गौरीशंकर तालाब (बोर तालाब) जैसी बड़ी योजनाओं से पानी की समस्या हल की।
- गिर गाय की नस्ल के संवर्धन में योगदान दिया, जिससे ब्राजील तक भावनगर का नाम पहुंचा।
- भावनगर को व्यापार और औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
इन सभी कार्यों के पीछे उनकी प्रजावत्सलता और दूरदृष्टि थी। प्रजा उन्हें इतना प्रिय मानती थी कि लोग उन्हें "प्रातःस्मरणीय" कहते थे। 1948 के बाद वे मद्रास राज्य के पहले भारतीय गवर्नर भी बने।
2 अप्रैल 1965 को मात्र 52 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका त्याग और कार्य आज भी जीवंत हैं। भावनगर विश्वविद्यालय उनके नाम से जाना जाता है, अनेक संस्थाएं उनकी याद में हैं।
आज जब हम त्याग दिवस मनाते हैं, तो याद रखें कि एक महाराजा ने राज्य की सत्ता छोड़कर लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता को चुना। उनके जैसे त्यागी व्यक्तित्व आज के युग को भी प्रेरणा देते हैं – कि व्यक्तिगत सुख से बड़ा राष्ट्र और प्रजा का कल्याण है।
जय हिंद! जय त्याग!
प्रातःस्मरणीय महाराजा कृष्णकुमारसिंहजी अमर रहें!
सज्जादअली नयानी ✍
Friday World – 15 जनवरी, 2026