-Friday World January 17,2026
आज की तारीख में दुनिया एक बार फिर उस पुरानी हकीकत के सामने खड़ी है, जहां बड़े साम्राज्यवादी ताकतें अपने हितों के लिए छोटे देशों में अशांति और फ़ितना फैलाने से बाज नहीं आतीं। ईरान में पिछले कुछ हफ्तों से जारी व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा, "विरोध जारी रखो... मदद रास्ते में है।" यह बयान न सिर्फ ईरानी सरकार के लिए चुनौती था, बल्कि एक खतरनाक संकेत भी, जो दुनिया भर में सवाल खड़े कर रहा है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने इसे सीधे तौर पर अमेरिकी हस्तक्षेप करार दिया। उन्होंने ट्रंप को "अपराधी" कहा और आरोप लगाया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद इस अशांति में दखल दिया, बयान दिए, दंगाइयों को प्रोत्साहित किया और सैन्य मदद का वादा किया। खामेनेई के मुताबिक, यह प्रदर्शन पहले की घटनाओं से अलग थे क्योंकि इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति खुद खुलकर शामिल हो गए। ईरानी सरकारी मीडिया ने इन प्रदर्शनकारियों को "आतंकवादी" और "दंगाई" करार दिया, जिन्हें अमेरिका और इज़राइल ने ऑर्केस्ट्रेट किया।
ट्रंप के बयानों ने न सिर्फ तेहरान में हलचल मचा दी, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। प्रदर्शनों में हजारों मौतें हो चुकी हैं, शहरों में हिंसा फैली हुई है, और ईरानी हुकूमत ने इसे बाहरी साजिश का नतीजा बताया। ईरान ने फांसी जैसे सख्त कदमों की तैयारी की, लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद 800 से ज्यादा फांसियां रद्द कर दी गईं—जिसकी ट्रंप ने "बहुत इज्जत" जताई, लेकिन साथ ही सैन्य कार्रवाई की धमकी भी जारी रखी।
पर्दे के पीछे की साजिश: अमेरिका और ज़ायोनी शासन की मिलीभगत सवाल यह है कि क्या यह सब महज संयोग था? या फिर एक सुनियोजित प्लान का हिस्सा? कई विश्लेषकों और ईरानी अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और ज़ायोनी शासन (इज़राइल) ने मिलकर इस फ़ितने को हवा दी। ईरान लंबे समय से ज़ायोनी हितों के खिलाफ खड़ा रहा है—चाहे वह फिलिस्तीन का समर्थन हो या क्षेत्रीय प्रतिरोध की अगुवाई।
ट्रंप प्रशासन ने पहले भी इज़राइल को अरबों डॉलर के हथियार और संसाधन मुहैया कराए, जिनका इस्तेमाल गज़ा जैसे इलाकों में किया गया। ईरानी प्रदर्शनों में सक्रिय कारक दो तरह के थे:
1. पहला वर्ग — वे लोग जो सड़कों पर आग लगाने, डर फैलाने, पुलिस से भागने और हिंसा फैलाने में लगे थे। ये पैदल सैनिक थे, जिनका मकसद शहरों, घरों, कार्यालयों और औद्योगिक केंद्रों पर हमला करना था। इनका ज़ायोनी शासन या खुफिया एजेंसियों से कोई सीधा संबंध नहीं दिखता, लेकिन उनकी तैयारियां इतनी सुनियोजित थीं कि साफ झलकता है कि बड़े स्तर पर सपोर्ट था।
2. दूसरा वर्ग — पर्दे के पीछे की ताकतें, जहां अमेरिका और इज़राइल की खुफिया एजेंसियां सक्रिय थीं। ट्रंप के बयान "मदद आ रही है" इसी छिपी मदद का इशारा थे—चाहे वह लॉजिस्टिक सपोर्ट हो, फंडिंग हो या सैन्य हस्तक्षेप की धमकी।
यह सब ईरान को अस्थिर करने की पुरानी रणनीति का हिस्सा लगता है। अमेरिका और ज़ायोनी लॉबी हमेशा से ऐसे देशों को निशाना बनाते आए हैं जो उनके वर्चस्व को चुनौती देते हैं। ईरान में यह फ़ितना बड़े कामों के लिए बहुत सारी तैयारियों के साथ शुरू किया गया था—इंटरनेट बंद करना, हिंसक दमन और अंतरराष्ट्रीय दबाव का खेल।
हमारा रुख साफ है हम अमेरिकी राष्ट्रपति को अपराधी मानते हैं। एक ऐसे नेता को, जो खुले तौर पर दूसरे देशों में अशांति फैलाने वालों को प्रोत्साहित करता है, लोकतंत्र का पैरोकार नहीं कहा जा सकता। यह दोहरा मापदंड है—जहां घरेलू विरोधों पर सख्ती बरती जाती है, वहीं विदेशी अशांति को बढ़ावा दिया जाता है।
ईरान की जनता ने बार-बार साबित किया है कि वह बाहरी साजिशों के आगे नहीं झुकती। लेकिन दुनिया को यह समझना होगा कि ऐसे फ़ितने सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहते—ये पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकते हैं, लाखों जिंदगियां तबाह कर सकते हैं।
अंत में, सच यही है कि शांति और स्थिरता तभी संभव है जब बड़े साम्राज्यवादी ताकतें अपने हितों के लिए छोटे देशों को जलाने से बाज आएं। ईरान अकेला नहीं है—यह लड़ाई उन सभी के लिए है जो आजादी, संप्रभुता और न्याय की बात करते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 17,2026