-Friday World-January 17,2206
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाख़ारोवा ने एक बार फिर पश्चिमी देशों की दोहरी नीति पर करारा प्रहार किया है। जनवरी 2026 में जारी तनाव के बीच उन्होंने सवाल उठाया: यूरोपीय अधिकारी ईरान की स्थिति पर इतनी बयानबाज़ी क्यों कर रहे हैं, जबकि उनका असली ध्यान ग्रीनलैंड पर होना चाहिए? क्या ईरान का मुद्दा उनके लिए सिर्फ एक बहाना बन गया है, ताकि जनता का ध्यान उस द्वीप से हटाया जा सके, जिसे अमेरिका जबरन हथियाने की कोशिश कर रहा है?
ज़ाख़ारोवा ने स्पुतनिक रेडियो को दिए इंटरव्यू में कहा, "यूरोपीय संघ के अधिकारी ईरान की घटनाओं पर अत्यधिक ध्यान दे रहे हैं, ताकि मुख्य सवाल का जवाब न देना पड़े: ग्रीनलैंड के साथ क्या हो रहा है? क्यों अब अपनी सारी कोशिशें ग्रीनलैंड पर केंद्रित नहीं कर रहे? क्या आपको नहीं लगता कि ईरान की स्थिति यूरोपीय अधिकारियों के लिए एक 'जीवनरक्षक बहाना' बन गई है, ताकि अपने लोगों का ध्यान इस तथ्य से भटकाया जा सके कि उनके द्वीप को बिना जनमत संग्रह के छीना जा रहा है?"
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2026 की शुरुआत में ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की पुरानी मांग को फिर से जोर-शोर से उठाया। ट्रंप ने बार-बार कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "मुक्त दुनिया की रक्षा" के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने यहां तक कहा कि यह "आसान तरीके से" या "कठिन तरीके से" होगा। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इसकी कड़ी निंदा की है, इसे क्षेत्रीय अखंडता पर हमला बताते हुए।
ग्रीनलैंड क्यों इतना महत्वपूर्ण? ग्रीनलैंड, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं और दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ एलिमेंट्स), यूरेनियम और लोहे जैसे संसाधनों तक पहुंच आसान हो गई है। ट्रंप प्रशासन इसे आर्कटिक में रणनीतिक लाभ के लिए देखता है, जहां रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी चिंता का विषय है। अमेरिका का दावा है कि ग्रीनलैंड को "रूस और चीन से बचाने" की जरूरत है, हालांकि ज़ाख़ारोवा ने इसे खारिज करते हुए कहा कि न रूस ने और न चीन ने कभी ऐसे आक्रामक इरादे जाहिर किए हैं।
यूरोपीय देशों ने भी प्रतिक्रिया दी है। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, फिनलैंड और नॉर्वे जैसे देशों की सेनाएं ग्रीनलैंड में पहुंच रही हैं, ताकि सुरक्षा मजबूत की जा सके। डेनमार्क ने इसे NATO के तहत सामूहिक रक्षा का हिस्सा बताया है। लेकिन ज़ाख़ारोवा का कहना है कि यूरोप ईरान के विरोध प्रदर्शनों (जिनमें हजारों मौतें हुई हैं) पर फोकस करके अपनी असफलता छिपा रहा है। ईरान में जारी अशांति को लेकर यूरोपीय नेता जैसे काया कलास ने रिजीम चेंज की बात की, जिसे ज़ाख़ारोवा ने "अपमानजनक" करार दिया।
पश्चिम की दोहरी नीति का खुलासा ज़ाख़ारोवा ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या यूरोपीय अधिकारी जानते भी हैं कि ग्रीनलैंड कहां है और ईरान कहां? उनका आरोप है कि ईरान का मुद्दा यूरोप के लिए सुविधाजनक बहाना बन गया है, ताकि अमेरिका की विस्तारवादी नीतियों पर सवाल न उठें। ग्रीनलैंड को बिना रेफरेंडम के छीना जाना एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन यूरोप चुप्पी साधे हुए है। यह वही यूरोप है जो क्राइमिया जैसे मामलों में रूस पर तीखे हमले करता रहा है।
रूसी प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि रूस और चीन इस क्षेत्र में सहयोग चाहते हैं, न कि कब्जा। लेकिन अमेरिका इसे अपने वर्चस्व के लिए इस्तेमाल कर रहा है। जनवरी 2026 में अमेरिकी कांग्रेस में ग्रीनलैंड के "एनएक्सेशन" का बिल भी पेश किया गया, जिसने तनाव और बढ़ा दिया।
हमारा रुख: संप्रभुता का सम्मान जरूरी यह घटनाक्रम दिखाता है कि बड़े साम्राज्यवादी ताकतें अपने हितों के लिए छोटे देशों की संप्रभुता को कितनी आसानी से कुचल सकती हैं। ग्रीनलैंड के लोग खुद फैसला करेंगे कि उनका भविष्य क्या होगा—न कि वाशिंगटन या ब्रुसेल्स। ईरान का मुद्दा गंभीर है, लेकिन इसे ग्रीनलैंड की समस्या को ढकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
ज़ाख़ारोवा का संदेश साफ है: यूरोप को अपनी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि दूसरों की आंतरिक मामलों में दखल देकर। अगर ग्रीनलैंड जैसा द्वीप बिना जनमत के छीना जा सकता है, तो आज कोई भी सुरक्षित नहीं। यह समय है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का सम्मान किया जाए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-January 17,2206