-Friday World 18th 2026
अमेरिकी दबाव में झुका भारत? रूस से आयात में 40% की भारी गिरावट, अब वेनेजुएला की ओर नजर!
भारत की ऊर्जा नीति में बड़ा उलटफेर हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सख्त रुख और लगाए गए भारी टैरिफ के दबाव में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीदारी में जबरदस्त कटौती कर दी है। ताजा आंकड़ों से साफ हो गया है कि जनवरी 2026 में रूस से भारत की कुल माल आयात में 40.48% की भारी गिरावट दर्ज की गई। जहां जनवरी 2025 में यह आंकड़ा लगभग 4.81 बिलियन डॉलर था, वहीं अब यह घटकर मात्र 2.86 बिलियन डॉलर रह गया। इस गिरावट का मुख्य कारण भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी क्रूड ऑयल की खरीद में किया गया बड़ा कटौती है।
रूस से भारत की कुल आयात में करीब 80% हिस्सा सिर्फ कच्चे तेल का होता है। यानी यह गिरावट लगभग पूरी तरह से तेल आयात की कमी से जुड़ी हुई है। अनुमान है कि जनवरी में रूसी क्रूड की आयात मात्र 2.3 बिलियन डॉलर या उससे भी कम रही होगी। रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी प्राइवेट रिफाइनरी ने स्पष्ट कर दिया है कि जनवरी में उन्हें रूसी तेल की कोई डिलीवरी नहीं मिली और आगे भी ऐसी उम्मीद नहीं है। सरकारी रिफाइनरियां भी अब धीरे-धीरे इस दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।
ट्रंप के टैरिफ का दबाव और भारत-अमेरिका व्यापार समझौता यह सब 2025 से शुरू हुए अमेरिका-भारत व्यापार तनाव का नतीजा है। अप्रैल 2025 में ट्रंप प्रशासन ने 'लिबरेशन डे' टैरिफ की घोषणा की और रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाया। अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद के लिए 25% का अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ लगाया, जो कुल मिलाकर 50% तक पहुंच गया। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हुआ और भारत को मजबूरन बातचीत की मेज पर आना पड़ा।
फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौता हुआ, जिसमें अमेरिका ने भारत पर लगे अतिरिक्त 25% टैरिफ हटा दिए और रेसिप्रोकल टैरिफ को 25% से घटाकर 18% कर दिया। बदले में भारत ने रूसी तेल की खरीदारी रोकने का वादा किया और अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई, जिसमें ऊर्जा क्षेत्र में 500 बिलियन डॉलर तक के आयात शामिल हैं। ट्रंप ने खुद कहा कि भारत अब रूसी तेल की जगह अमेरिकी और वेनेजुएलन तेल खरीदेगा।
वेनेजुएला बन रहा नया विकल्प रूस से दूरी बनते ही भारत की नजर अब वेनेजुएला पर टिक गई है। वेनेजुएला का तेल सस्ता है और भारी-खट्टा (heavy sour) प्रकार का होने से कुछ भारतीय रिफाइनरियां इसे आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं। ट्रंप ने 31 जनवरी 2026 को संकेत दिया कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदेगा, खासकर ईरान की जगह। हालांकि वेनेजुएला की उत्पादन क्षमता सीमित है और सालों की प्रतिबंधों से वह पूरी तरह रिकवर नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिकी दबाव में अब वेनेजुएला पर प्रतिबंध ढीले पड़ रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के बाद वहां अमेरिकी कंपनियों को तेल उत्पादन की अनुमति दी है। भारत के लिए यह एक रणनीतिक विकल्प है, क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा बनी रहेगी और अमेरिका के साथ संबंध भी मजबूत होंगे। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वेनेजुएला अकेला रूस की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता, क्योंकि भारत रोजाना 1.5 मिलियन बैरल से ज्यादा रूसी तेल आयात करता था।
भारत की ऊर्जा रणनीति में बदलाव भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। रूस से सस्ता तेल मिलने के कारण 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी क्रूड का हिस्सा 35% तक पहुंच गया था। लेकिन अब अमेरिकी दबाव, टैरिफ और व्यापार समझौते के चलते भारत विविधीकरण की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी तेल, वेनेजुएला और अन्य स्रोतों से आयात बढ़ेगा।
यह बदलाव सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है। भारत ने रूस के साथ पुराने रिश्ते बनाए रखे हैं, लेकिन अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी को प्राथमिकता दी जा रही है। रिलायंस जैसी कंपनियां पहले ही रूसी तेल से दूर हो चुकी हैं, जबकि सरकारी रिफाइनरियां भी धीरे-धीरे अनुकूलन कर रही हैं।
क्या यह मजबूरी या रणनीति? क्या भारत अमेरिकी दबाव में आ गया? आंकड़े यही कहते हैं। लेकिन यह मजबूरी से ज्यादा रणनीतिक फैसला लगता है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार संतुलन और वैश्विक संबंधों को संतुलित रखने के लिए भारत ने यह कदम उठाया। आने वाले महीनों में रूस पर निर्भरता और कम होगी और नए बाजार जैसे अमेरिका, वेनेजुएला और अन्य खुलेंगे।
यह बदलाव भारत की विदेश नीति की लचीलापन दिखाता है – जहां जरूरत पड़ने पर पुराने दोस्त से दूरी बनाकर नए रास्ते तलाशे जाते हैं। ट्रंप का 'ऑयल गेम' सफल होता दिख रहा है, लेकिन भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी होने में समय लगेगा।
Sajjadali Nayani ✍
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