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Sunday, 15 March 2026

"चाय से प्रधानमंत्री तक का सफर: मोदी का 'कर्ज उतारने' का वादा और बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज – असम के चाय बागान मजदूरों ने उठाए सवाल"

"चाय से प्रधानमंत्री तक का सफर: मोदी का 'कर्ज उतारने' का वादा और बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज – असम के चाय बागान मजदूरों ने उठाए सवाल"
-Friday World March 15,2026
हाल ही में असम के चाय बागानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा ने एक बार फिर राजनीतिक बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने वहां चाय बागान श्रमिकों को भूमि अधिकार (पट्टा) वितरित करते हुए कहा कि वे चाय बेचकर बड़ा हुआ हूं और अब इस समुदाय का "कर्ज उतारने" आए हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा, "आपके द्वारा उगाई गई चाय गुजरात पहुंची, जहां मैंने उसे बेचा। आज मुझे आपके सम्मान का अवसर मिला है, यह मेरे लिए कर्ज चुकाने जैसा है।" यह बयान सुनने में भावुक और प्रेरणादायक लगता है, लेकिन असम के आम नागरिकों और चाय बागान श्रमिकों ने इसे खारिज करते हुए कड़ी आपत्ति जताई। एक श्रमिक ने मीडिया से कहा, 

"आप गुजरात के मुख्यमंत्री बने तब गुजरात का कर्ज कितना था और अब कितना है? प्रधानमंत्री बने तब भारत का कर्ज कितना था और अब कितना है? आप कर्ज उतारने नहीं, कर्ज में डुबोने आए हो। जुमले नहीं, हकीकत पर बात करें।" उन्होंने मीडिया से अपील की कि सच्चाई दिखाए, वरना जन आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है और रोकना मुश्किल हो जाएगा। 

यह घटना सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों, कर्ज प्रबंधन और राजनीतिक दावों की गहराई को उजागर करती है। आइए तथ्यों के आधार पर इसकी पड़ताल करें। 

मोदी का चाय बेचने से प्रधानमंत्री बनने का सफर** प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपनी शुरुआती जिंदगी का जिक्र करते हैं – बचपन में चाय बेचना, रेलवे स्टेशन पर काम करना और संघर्ष से ऊपर उठना। असम के चाय बागान मजदूरों से बात करते हुए उन्होंने इसे व्यक्तिगत कनेक्शन बताया। चाय उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, खासकर असम में जहां लाखों मजदूर पीढ़ियों से काम करते आ रहे हैं। इन मजदूरों की स्थिति दयनीय रही है – कम मजदूरी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और भूमि अधिकारों से वंचित होना। मोदी सरकार ने अब इन्हें पट्टा देकर "ऐतिहासिक अन्याय" सुधारने का दावा किया है। यह कदम सराहनीय है, लेकिन सवाल कर्ज और आर्थिक प्रबंधन पर हैं। 

गुजरात का कर्ज: मोदी के मुख्यमंत्री काल में क्या हुआ?

 नरेंद्र मोदी अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उस समय राज्य का सार्वजनिक कर्ज लगभग 45,000 से 53,000 करोड़ रुपये के आसपास था (विभिन्न स्रोतों के अनुसार 45,301 करोड़ या 53,000 करोड़)। 2014 में जब वे प्रधानमंत्री बने, तब गुजरात का कर्ज बढ़कर लगभग 2.21 लाख करोड़ रुपये हो गया था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे 1.65 लाख करोड़ से 2.21 लाख करोड़ तक बताया गया है। 

यह वृद्धि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, औद्योगिक विकास और "गुजरात मॉडल" के नाम पर हुई। आलोचक कहते हैं कि यह विकास दिखावटी था, जबकि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्रों पर खर्च कम रहा। गुजरात में कर्ज बढ़ा, लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई – हालांकि कर्ज-जीडीपी अनुपात भी प्रभावित हुआ। 

भारत का राष्ट्रीय कर्ज: 2014 से अब तक का सफर** 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने, केंद्र सरकार का कुल कर्ज (आंतरिक + बाहरी) लगभग 55-58 लाख करोड़ रुपये था। विभिन्न आधिकारिक और रिपोर्ट्स के अनुसार: 

- मार्च 2014 में केंद्र का कर्ज करीब 58.6 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 52.2%)। 

- कुछ स्रोतों में 55 लाख करोड़ या 54-58 लाख करोड़ के बीच। 

2025-2026 तक स्थिति: 

- मार्च 2025 तक केंद्र का कर्ज 181-200 लाख करोड़ रुपये पार कर चुका है। 

- 2026 के अंत तक अनुमानित 197-214 लाख करोड़ रुपये (बजट अनुमानों के अनुसार)। 

- जीडीपी के प्रतिशत में कर्ज 56-81% के बीच रहा, कोविड के दौरान 89% तक पहुंचा, अब घटकर 80% के आसपास। 

- बाहरी कर्ज 2014 में करीब 457 बिलियन डॉलर (लगभग 30 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर 2023-2025 में 646-736 बिलियन डॉलर हो गया। 

यह वृद्धि तीन गुना से अधिक है। कोविड महामारी, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, सब्सिडी और आर्थिक पैकेज के कारण कर्ज बढ़ा। सरकार का दावा है कि यह निवेश विकास के लिए जरूरी था – जीडीपी ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर और गरीबी उन्मूलन में प्रगति हुई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि कर्ज का बोझ आम आदमी पर पड़ रहा है – प्रति व्यक्ति कर्ज 2014 के 43,000 रुपये से बढ़कर अब 1.3-1.5 लाख रुपये के आसपास। **श्रमिकों का सवाल जायज क्यों है?

श्रमिकों ने ठीक कहा – अगर चाय बेचकर प्रधानमंत्री बने, तो कर्ज क्यों बढ़ा? गुजरात में मुख्यमंत्री बनने पर कर्ज बढ़ा, देश में प्रधानमंत्री बनने पर और ज्यादा। "कर्ज उतारने" का दावा भावुक लगता है, लेकिन आंकड़े उलटे कहानी बयां करते हैं। असम के चाय बागान मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए पट्टा वितरण अच्छा कदम है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक नीतियां मजदूरों, किसानों और आम नागरिकों के लिए कितनी फायदेमंद हैं? 

आगे क्या?** यह बहस सिर्फ असम तक सीमित नहीं। मीडिया को चाहिए कि हकीकत दिखाए – कर्ज बढ़ने के कारण, विकास के फायदे और नुकसान दोनों। अगर नागरिक आक्रोश सड़कों पर उतरा, तो लोकतंत्र में सवाल उठाना उनका हक है। राजनीति में जुमले चल सकते हैं, लेकिन हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

 भारत एक उभरती अर्थव्यवस्था है। कर्ज प्रबंधन, निवेश और विकास का संतुलन जरूरी है। असम के इस संवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है – क्या हम विकास के नाम पर कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं? समय है पारदर्शी बहस का, ताकि "चाय वाला" का सपना सच हो, न कि सिर्फ कहानी बने।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 15,2026