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Sunday, 15 March 2026

प्रोपगंडा: सत्य को मोड़ने की कला – जब राक्षस देवता और देवता राक्षस बन जाते हैं

प्रोपगंडा: सत्य को मोड़ने की कला – जब राक्षस देवता और देवता राक्षस बन जाते हैं
-Friday World March 15,2026
प्रोपगंडा क्या है?

 प्रोपगंडा वह व्यवस्थित और जानबूझकर की जाने वाली सूचना का प्रसार है, जिसमें तथ्यों, आधे-सच, झूठ, अफवाहों या भावनात्मक अपील का इस्तेमाल करके लोगों की राय, विश्वास और व्यवहार को प्रभावित किया जाता है। यह केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उसे इस तरह चुनिंदा तरीके से पेश करना है कि लक्षित व्यक्ति या समाज एक खास निष्कर्ष पर पहुंचे – चाहे वह निष्कर्ष सत्य से कितना भी दूर क्यों न हो। 

प्रोपगंडा का इतिहास पुराना है, लेकिन आधुनिक रूप में इसे एडवर्ड बर्नेज़ ने "पब्लिक रिलेशंस" के पिता के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने अपनी किताब *Propaganda* (1928) में लिखा कि "इंटेलिजेंट लोग समझते हैं कि प्रोपगंडा आधुनिक समाज का आवश्यक उपकरण है।" बर्नेज़ ने सिगमंड फ्रायड के भतीजे होने के नाते मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके जनमत को "इंजीनियर" करने की तकनीकें विकसित कीं – जैसे भावनाओं को उकसाना, दोहराव, प्रतीकों का उपयोग और सेलिब्रिटी या अथॉरिटी फिगर के जरिए विश्वास बनाना। 

नाजी प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने बर्नेज़ की किताबों को पढ़ा और उन्हें नाजी प्रोपगंडा का आधार बनाया। गोएबल्स का मशहूर सिद्धांत था: "झूठ इतना बड़ा हो कि लोग उसे सच मान लें, और उसे बार-बार दोहराओ।" आज के सोशल मीडिया, टीवी चैनल और राजनीतिक कैंपेन में यही तकनीकें काम करती हैं – फेक न्यूज, सेलेक्टिव फैक्ट्स, फियर मॉन्गरिंग और "असली बनाम नकली" का नैरेटिव। 

दुनिया का सबसे खतरनाक इंसान: किम जोंग उन vs अमेरिका का "शांति दूत" चेहरा

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को दुनिया भर में "तानाशाह", "पागल", "खतरनाक" कहा जाता है। मीडिया में उनकी तस्वीरें कार्टून जैसी बनाई जाती हैं – मोटा, छोटा, हास्यास्पद। लेकिन सच्चाई क्या है? किम ने किसी विदेशी शहर पर बम नहीं गिराया, किसी देश की जमीन पर कब्जा नहीं किया, लाखों-करोड़ों लोगों की मौत नहीं करवाई। उत्तर कोरिया का न्यूक्लियर प्रोग्राम डिफेंसिव है – अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सैन्य मौजूदगी के सामने अस्तित्व की लड़ाई। 

फिर भी, पश्चिमी मीडिया और ग्लोबल नैरेटिव में किम "दुनिया का सबसे बड़ा खतरा" है। क्यों? क्योंकि प्रोपगंडा ने उन्हें ऐसा बना दिया। 

दूसरी तरफ अमेरिका खुद को "शांति का पैरोकार" बताता है। कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों को नोबेल शांति पुरस्कार मिला – जैसे थियोडोर रूजवेल्ट, जिमी कार्टर, बराक ओबामा। ओबामा को 2009 में पुरस्कार मिला, जब वे अभी राष्ट्रपति बने ही थे। लेकिन उनके कार्यकाल में ड्रोन हमलों से हजारों निर्दोष मारे गए

 – पाकिस्तान, यमन, सोमालिया, अफगानिस्तान में। ओबामा के समय अमेरिका ने 26,000 से ज्यादा बम गिराए। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया – अमेरिकी हस्तक्षेप से लाखों नागरिक मारे गए। फिर भी अमेरिका "मानवाधिकारों का रक्षक" बना रहता है। 

यह प्रोपगंडा है: "हमारी हिंसा न्याय है, उनकी हिंसा आतंकवाद।" मीडिया, हॉलीवुड, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं – सब इस नैरेटिव को दोहराती हैं। 

भारत में मुसलमानों के साथ प्रोपगंडा का खेल भारत में पिछले दस सालों में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। गाय से जुड़ी हिंसा में 2010 से 2017 तक 86% मृतक मुसलमान थे। मोब लिंचिंग, मस्जिद-मदरसा तोड़फोड़, अफवाहों पर हमले – सैकड़ों मामले दर्ज हुए। कई रिपोर्ट्स में 2014 के बाद हिंसा में तेज उछाल आया। 

फिर भी मुख्यधारा का नैरेटिव क्या कहता है? मुसलमान "जिहादी", "कट्टरपंथी", "देशद्रोही"। एक तरफ मोब लिंचिंग करने वाले "संस्कारवान", "अहिंसा परमो धर्म" मानने वाले बताए जाते हैं। "वसुधैव कुटुंबकम" का नारा लगाते हुए भीड़ हिंसा को "गौ-रक्षा" या "राष्ट्रभक्ति" का नाम दे दिया जाता है। 

प्रोपगंडा की तकनीकें यहां साफ दिखती हैं: 

- फियर मॉन्गरिंग: "लव जिहाद", "पॉपुलेशन जिहाद", "लैंड जिहाद" जैसे शब्द फैलाकर डर पैदा करना।

 - सेलेक्टिव रिपोर्टिंग: हिंसा के पीड़ितों को "गैरकानूनी काम" करने वाला दिखाना, जबकि अपराधियों को "भीड़ का गुस्सा"। 

- दोहराव: टीवी डिबेट, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स से एक ही नैरेटिव बार-बार। 

- अन्यीकरण: मुसलमानों को "अंदर का दुश्मन" बनाना।

 परिणाम? हिंसा सामान्य हो जाती है, और पीड़ित दोषी ठहराए जाते हैं। 

प्रोपगंडा से कैसे बचें? प्रोपगंडा को पहचानना आसान नहीं, क्योंकि यह भावनाओं से काम करता है। लेकिन कुछ सवाल पूछें: 

- सूचना किसने दी? क्या स्रोत विश्वसनीय है?

 - क्या सिर्फ एक तरफ की बात दिखाई जा रही है? 

- भावनाएं उकसाई जा रही हैं – डर, गुस्सा, घृणा?

 - तथ्य क्या कहते हैं, न कि सिर्फ नैरेटिव? 

सच की तलाश में कई स्रोत पढ़ें, इतिहास देखें, और सबसे महत्वपूर्ण – अपनी भावनाओं पर काबू रखें। क्योंकि प्रोपगंडा तभी काम करता है, जब हम बिना सोचे मान लेते हैं। 

आज का दौर सूचना का युग है, लेकिन प्रोपगंडा का भी युग है। जो इसे समझ लेगा, वही सच तक पहुंचेगा। अन्यथा, हम सब किसी न किसी के "इंजीनियर्ड कंसेंट" का हिस्सा बन जाते हैं। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15,2026