26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल से लौटे, जहां उन्होंने नेतन्याहू के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया और क्षेत्रीय स्थिरता की बात की। महज दो दिन बाद, 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और 'ऑपरेशन रोअरिंग लायन' के तहत ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू कर दिए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई सहित कई शीर्ष अधिकारी मारे गए। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए, जिसमें यूएई, कतर, बहरीन जैसे देश प्रभावित हुए।
इस संकट में भारत की प्रतिक्रिया क्या रही? क्या नई दिल्ली ने ईरान के साथ अपनी ऐतिहासिक गर्मजोशी को बनाए रखा, या इज़राइल-अमेरिका के साथ निकटता ने इसे प्रभावित किया? और सबसे बड़ा सवाल—क्या अब ईरान के साथ संबंध सुधारने में देर हो चुकी है?
भारत की शुरुआती प्रतिक्रिया: संतुलन की कोशिश** संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद भारत ने दो प्रमुख बयान जारी किए। पहला बयान विदेश मंत्रालय का था, जिसमें पश्चिम एशिया में घटनाक्रम पर "गहरी चिंता" जताई गई और सभी पक्षों से संयम बरतने, युद्धविराम और बातचीत के माध्यम से समस्याओं के हल की अपील की गई। इसमें किसी भी पक्ष की खुली निंदा नहीं की गई—न अमेरिका-इज़राइल के हमलों की, न ही ईरान की जवाबी कार्रवाई की।
दूसरा बयान पीएम मोदी का था, जब उन्होंने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से बात की और यूएई पर ईरानी हमलों की "कड़ी निंदा" की। मोदी ने कहा, "भारत यूएई के साथ खड़ा है" और नागरिकों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया। इसी तरह, उन्होंने सऊदी अरब, बहरीन और अन्य खाड़ी देशों के नेताओं से बात की और उनके साथ एकजुटता जताई।
हालांकि, ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल हमलों की खुली निंदा भारत ने नहीं की। विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने इसे "नैतिक कायरता" करार दिया और कहा कि खामेनेई की हत्या पर चुप्पी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के खिलाफ है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मोदी की इज़राइल यात्रा (25-26 फरवरी) के ठीक बाद हमलों का समय संयोग नहीं था, और भारत की चुप्पी ने ईरान में असंतोष पैदा किया।
12 मार्च का महत्वपूर्ण फोन कॉल: मोदी-पेज़ेशकियान बातचीत** संघर्ष शुरू होने के 12-13 दिनों बाद, 12 मार्च 2026 को पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान से फोन पर बात की—यह पहली उच्च-स्तरीय संपर्क था। मोदी ने क्षेत्रीय स्थिति पर "गहरी चिंता" जताई, नागरिक मौतों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, माल और ऊर्जा के निर्बाध परिवहन पर जोर दिया और शांति-स्थिरता के लिए संवाद व कूटनीति की अपील की।
पेज़ेशकियान ने ईरान की स्थिति स्पष्ट की—कि वे युद्ध नहीं चाहते, बल्कि "अमेरिकी-इज़राइली आक्रामकता" के खिलाफ आत्मरक्षा कर रहे हैं। दोनों नेताओं ने बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई।
इससे पहले, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से कई बार (फरवरी अंत से मार्च तक कम से कम 4 बार) बात की। इन बातचीतों में होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही पर फोकस रहा। परिणामस्वरूप, ईरान ने भारतीय फ्लैग वाले टैंकरों को सुरक्षित गुजरने की अनुमति दी—कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, 2-3 टैंकर पहले ही गुजर चुके हैं, और 20 से अधिक के लिए बात चल रही है।
ईरान के साथ भारत के संबंध: ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान चुनौतियां** भारत-ईरान संबंध दशकों पुराने हैं—चाबहार पोर्ट, ऊर्जा आयात, BRICS में सहयोग। ईरान भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है, और होर्मुज़ भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन अमेरिका-इज़राइल के साथ मजबूत संबंध (रक्षा सौदे, क्वाड) ने भारत को संतुलन बनाए रखने की मजबूरी दी।
संघर्ष में भारत ने किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया—न इज़राइल के हमलों की निंदा, न ईरान की जवाबी कार्रवाई की। यह "सभी पक्षों से संयम" वाली नीति भारत की पारंपरिक "रणनीतिक स्वायत्तता" को दर्शाती है। लेकिन ईरान में कुछ लोग इसे "विश्वासघात" मानते हैं, खासकर मोदी की इज़राइल यात्रा के समय।
**क्या देर हो चुकी है?** नहीं, अभी देर नहीं हुई है। - मोदी-पेज़ेशकियान कॉल और जयशंकर-अराघची की लगातार बातचीत से संकेत मिलता है कि कूटनीतिक चैनल खुले हैं।
- ईरान ने भारतीय जहाजों को विशेष छूट दी, जो दर्शाता है कि संबंध पूरी तरह टूटे नहीं।
- भारत ने रूसी तेल पर अमेरिकी छूट ली, लेकिन ईरान से बातचीत जारी रखी—यह बहुआयामी ऊर्जा रणनीति है।
- युद्ध लंबा चलेगा, लेकिन भारत की स्थिति "शांति दूत" वाली है, जो भविष्य में मध्यस्थता की भूमिका निभा सकती है।
हालांकि, चुनौतियां हैं—होर्मुज़ बंद होने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, भारतीय प्रवासी प्रभावित हैं, और घरेलू राजनीति में विपक्ष इसे "अकेलापन" बता रहा है। यदि ईरान मजबूत हुआ या रेजीम चेंज हुआ, तो भारत को नई वास्तविकताओं से जूझना पड़ेगा।
भारत ने समय पर कूटनीति की—इज़राइल के साथ मजबूती, खाड़ी देशों के साथ एकजुटता, और ईरान के साथ संवाद। यह देर नहीं, बल्कि सावधानीपूर्ण कदम है। विश्वास बहाली के लिए और प्रयास जरूरी हैं, लेकिन दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ। भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलन पर टिकी रही है—और इस संकट में भी वही जारी है। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ेगा, भारत की भूमिका और स्पष्ट होगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 14,2026