- Friday World September 23,2026
नई दिल्ली: देश में चल रहे EC-SIR यानी Special Intensive Revision (विशेष गहन पुनरीक्षण) विवाद ने अब संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
प्रशांत भूषण ने कहा है कि, "ज्ञानेश कुमार को केवल पद से हटाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए।"
क्या है पूरा मामला? प्रशांत भूषण के 3 बड़े आरोप
1. चुनाव आयोग में आंतरिक फूट और मनमाने फैसले:
प्रशांत भूषण का दावा है कि चुनाव आयोग में 3 चुनाव आयुक्त होते हैं, लेकिन मौजूदा समय में आयोग एक व्यक्ति का निजी गढ़ बन गया है। उनके अनुसार बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में लगभग 14 बार आयोग के फैसलों पर आपत्ति जताई है। आरोप है कि जानकारी के बिना और बिना सहमति के फैसले लिए जा रहे हैं, और दोनों आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
2. IT व्यवस्था का केंद्रीकरण:
सबसे गंभीर आरोप चुनाव आयोग की IT प्रणाली को लेकर है। भूषण के अनुसार ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की पूरी आईटी व्यवस्था को इस हद तक केंद्रीकृत कर दिया है कि दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय से ही तय हो रहा है कि किसका नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाए, किसका नहीं जोड़ा जाए और किसका नाम हटाया जाए। पहले यह काम राज्य स्तर पर विकेंद्रीकृत तरीके से होता था।
3. मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटना:
SIR विवाद की शुरुआत बिहार से हुई थी, जहां ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 60-65 लाख नाम हटाने की बात सामने आई थी। बाद में देशभर में यह आंकड़ा 1 करोड़ से ज्यादा बताया गया। विपक्ष इसे 'वोट चोरी' बता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में चुनाव आयोग को पारदर्शिता और सहमति सुनिश्चित करने की चेतावनी दी है और अगली सुनवाई 7 अक्टूबर तय की है।
चुनाव आयोग ने हालांकि इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
संवैधानिक सवाल
भारत में चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसका भरोसा उसकी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता पर टिका है। अगर तीन आयुक्तों में मतभेद और IT केंद्रीकरण के आरोप सही हैं तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। इसलिए प्रशांत भूषण ने मांग की है कि केवल इस्तीफा नहीं, बल्कि पूरी जांच और मुकदमा चलना चाहिए।
*डिस्क्लेमर:* यह लेख वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। इसमें लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज किया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 23,2026
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