-Friday World Oct 3,2026
उज्जैन, महाकाल की नगरी। 2028 में यहाँ सिंहस्थ महाकुंभ लगना है, जहाँ 10 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। सरकार के बड़े-बड़े दावे हैं - वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर, रोड वाइडनिंग, 24 घंटे बिजली। लेकिन पर्दे के पीछे क्या चल रहा है? दो तस्वीरें एक साथ सामने आ रही हैं - एक तरफ जंग लगे बिजली के पोल पर चमकता सिल्वर पेंट, दूसरी तरफ मलबे में तब्दील होती 600 साल पुरानी उज्जैन शाही मस्जिद।
और आरोप ये है कि ये दोनों तस्वीरें आपस में जुड़ी हुई हैं।
पहला खेल - 250 करोड़ का करंट घोटाला
सिंहस्थ 2028 की तैयारी के लिए विद्युत विभाग और नगर निगम को लगभग 250 करोड़ रुपये का फंड दिया गया। इस फंड से शिप्रा घाटों, महाकाल लोक से लेकर छत्री चौक और दत्त अखाड़ा तक नई अंडरग्राउंड लाइन, नए जीआई पोल, हाई मास्ट और फैंसी लाइटें लगनी थीं।
लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और कहती है। हमारे सूत्रों और स्थानीय पत्रकारों द्वारा ली गई तस्वीरों में साफ दिखता है कि ठेकेदारों ने नए पोल लगाने के बजाय 2008-2010 में लगे पुराने, पूरी तरह जंग खाए पोलों को ही दोबारा खड़ा कर दिया। ऊपर से सस्ता सिल्वर पेंट मार दिया ताकि दूर से नया लगे। कई जगह तो पोल के अंदर का सरिया दिख रहा है, फाउंडेशन में एक इंच सीमेंट नहीं है।
एक रिटायर्ड इंजीनियर ने बताया, "एक नए जीआई पोल की कीमत 45 से 60 हजार है। पुराने पर पेंट करने का खर्च 400 रुपये। बिल नए का बन रहा है, काम पुराने पर हो रहा है। 250 करोड़ में से अगर 70% भी खा लिया गया तो सोचिए कितना बड़ा घोटाला है।"
सवाल ये है कि सिंहस्थ में जब लाखों लोग एक घाट पर होंगे, तब अगर ये जर्जर पोल शॉर्ट सर्किट या हवा से गिर गया तो हादसा कितना बड़ा होगा? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
दूसरा खेल - शाही मस्जिद का डिमोलिशन, ध्यान भटकाने की स्क्रिप्ट?
ठीक इसी समय जब कुछ RTI कार्यकर्ताओं ने इस बिजली घोटाले के बिल, वर्क ऑर्डर और जियो-टैग फोटो मांगने शुरू किए, तभी अचानक उज्जैन शाही मस्जिद का मुद्दा गरमा गया।
उज्जैन की शाही मस्जिद लगभग 636 साल पुरानी बताई जाती है, जो छत्री चौक इलाके में है। प्रशासन का कहना है कि सिंहस्थ 2028 के रोड वाइडनिंग प्लान के तहत मस्जिद का कुछ अवैध हिस्सा और आसपास के अतिक्रमण हटाने हैं। इसमें मुख्यमंत्री मोहन यादव के पुश्तैनी मकान का हिस्सा भी चिन्हित किया गया है, ताकि निष्पक्षता दिखे।
लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप दूसरा है। उनका कहना है कि मस्जिद का मामला सालों से कोर्ट में है, हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने की खबरें भी हैं, लेकिन बुलडोजर की कार्रवाई का टाइमिंग बेहद संदिग्ध है। आरोप है कि जैसे ही 250 करोड़ के घोटाले की फाइलें मीडिया में लीक होने लगीं, वैसे ही जानबूझकर शाही मस्जिद के डिमोलिशन को प्राइम टाइम डिबेट बना दिया गया।
एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, "ये क्लासिक डायवर्जन पॉलिटिक्स है। जनता को हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद में उलझा दो, ताकि कोई ये न पूछे कि 250 करोड़ कहाँ गया? जो लोग बिजली के पोल की बात कर रहे थे, वो अब मस्जिद-मंदिर पर बहस कर रहे हैं। भ्रष्टाचार का करंट तो जमीन में ही दब गया।"
गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था
सबसे ज्यादा शर्म की बात ये है कि ये दोनों काम गांधी जयंती के आसपास ही हुए। 2 अक्टूबर को देश स्वच्छता और सत्य की बात कर रहा था, और उज्जैन में जंग को चमकाकर सच को दफनाया जा रहा था। क्या यही बापू के सपनों का भारत है? जहाँ सिंहस्थ जैसे पवित्र मेले में भी कमीशनखोरी हो?
अब उज्जैन की जनता तीन चीजों की मांग कर रही है:
1. 250 करोड़ के विद्युत कार्यों की CAG या लोकायुक्त से स्वतंत्र जांच हो, हर पोल की जियो-टैगिंग और लैब टेस्ट हो।
2. शाही मस्जिद सहित सभी 636 साल पुरानी धरोहरों के लिए रोड वाइडनिंग का निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन हो, क्या कोई दूसरा विकल्प नहीं था?
3. ये जांच हो कि क्या वाकई मस्जिद के डिमोलिशन के टाइमिंग का इस्तेमाल घोटाले से ध्यान हटाने के लिए किया गया? इसके लिए SIT बने।
महाकाल सब देख रहे हैं। सिंहस्थ आस्था का मेला है, घोटाले का नहीं। अगर अभी भी चांदी के पेंट से जंग छुपाई गई, तो 2028 में उज्जैन रोशनी से नहीं, बल्कि इन दोहरे घोटालों की बदनामी से दुनिया में जाना जाएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 3,2026
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