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Friday, 2 October 2026

ज्ञानेश्वर रहें या जाएं, मुसलमानों को फर्क नहीं पड़ना चाहिए - कुर्सी की लड़ाई में अब्दुल को मोहरा बनाना बंद करो, बच्चों की शिक्षा ही असली जीत है

ज्ञानेश्वर रहें या जाएं, मुसलमानों को फर्क नहीं पड़ना चाहिए - कुर्सी की लड़ाई में अब्दुल को मोहरा बनाना बंद करो, बच्चों की शिक्षा ही असली जीत है
- Friday World Oct 3,2026 
एक बहुत सच्ची बात सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है - "ज्ञानेश्वर जी रहें या जाएं..इससे मुसलमानों को कोई फर्क नहीं पड़ता है।"

यह एक लाइन पूरे राजनीतिक खेल को नंगा कर देती है।

आज देश में हर छोटी-बड़ी घटना में एक ही किरदार को जबरदस्ती घसीटा जाता है - मुसलमान को। कोई ज्ञानेश्वर महाराज हटे, कोई रामेश्वर महाराज आए, कोई कुर्सी पर बैठा, कोई कुर्सी से उतरा, लेकिन हर खबर के बीच में अब्दुल का नाम जरूर डाल दिया जाता है। क्यों?

क्योंकि इस देश की राजनीति की सबसे आसान सीढ़ी अब्दुल का कंधा बन गया है।

दोनों तरफ एक ही कहानी

 - पक्ष हो या विपक्ष दोनों अब्दुल के कंधे पर चढ़ कर सत्ता तक पहुँचते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई अब्दुल को नीचा दिखा कर, डरा कर, उसे विलेन बना कर कुर्सी पर कब्जा करता है, तो दूसरा उसे सपना दिखा कर, हमदर्दी का नाटक करके, वोट का सौदा करके कुर्सी तक पहुंचना चाहता है।

नतीजा दोनों में एक ही है - कुर्सी मिल जाती है नेताओं को, और अब्दुल बेचारा वही का वही खड़ा रह जाता है। उसी टूटी सड़क पर, उसी बेरोजगारी में, उसी स्कूल की फीस की चिंता में।

सोचिए, ज्ञानेश्वर जी हटेंगे तो क्या होगा? कुछ नहीं। उनकी जगह कोई और रामेश्वर महाराज आ जाएंगे। सिस्टम वही रहेगा, फाइलें वही रहेंगी, ठेके वही बंटेंगे। लेकिन इस पूरे ड्रामे में मुसलमानों को घसीट कर दो धर्मों के बीच नफरत की दीवार और ऊंची कर दी जाएगी।

जागो मुसलमानों जागो - तुम्हारी लड़ाई एज्युकेशन है

यह सबसे महत्वपूर्ण अपील है। मुसलमानों को समझना होगा कि यह कुर्सी की जंग तुम्हारी जंग नहीं है। यह सत्ता के भूखे लोगों की जंग है।

जब-जब तुम उनकी रैली में नारा लगाओगे, उनके लिए पोस्टर लगाओगे, उनके लिए दूसरे समुदाय से लड़ोगे, तब-तब तुम्हारा ही नुकसान होगा। तुम्हारा बेटा जो शाम को पढ़ना चाहिए था, वो व्हाट्सएप पर बहस में अपना वक्त बर्बाद कर देगा। तुम्हारी दुकान जो ईमानदारी से चलनी चाहिए थी, वो बंद हो जाएगी।

आज सबसे बड़ी जरूरत क्या है? क्या यह जानना जरूरी है कि ज्ञानेश्वर जी कौन हैं? नहीं। सबसे बड़ी जरूरत है यह पूछना कि मेरे बच्चे का स्कूल कैसा है? मेरे मोहल्ले में सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है या नहीं? मेरे बच्चे को कंप्यूटर आता है या नहीं?

असली सफलता का रास्ता

लेखक ने जो आखिरी लाइनें लिखी हैं, वही इस कौम के लिए सबसे बड़ा रोडमैप है:

1. मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करो: अब्दुल की सबसे बड़ी पहचान उसकी मेहनत है। चाहे वो पंचर की दुकान हो, कपड़े का कारोबार हो, या इंजीनियर की नौकरी हो। ईमानदारी से काम करोगे तो कोई तुम्हें नीचा नहीं दिखा पाएगा।

2. बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दो: आज एक मुसलमान परिवार अगर अपनी पूरी ताकत लगा दे कि मेरा बेटा-बेटी डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, अफसर बने, तो 20 साल बाद उसे किसी ज्ञानेश्वर या रामेश्वर के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मदरसे के साथ-साथ मॉडर्न एजुकेशन, साइंस, मैथ, अंग्रेजी पर जोर देना होगा।

3. राजनीतिक दलों की चाकरी छोड़ो: किसी भी दल का झंडा उठाने से पहले सोचो - क्या इस पार्टी ने मेरे बच्चे की फीस के लिए कुछ किया? क्या इस नेता ने मेरे इलाके में लाइब्रेरी बनवाई? अगर नहीं, तो उसके लिए अपना वक्त क्यों बर्बाद करना?

4. देश हित में ध्यान केंद्रित करो: जब तुम शिक्षित बनोगे, ईमानदार कारोबारी बनोगे, टैक्स दोगे, तो तुम खुद देश हित में काम कर रहे होगे। तुम्हें किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट देने की जरूरत नहीं है।

ज्ञानेश्वर जी का आना-जाना एक कुर्सी का खेल है। वह कुर्सी आज उसकी है, कल किसी और की होगी। लेकिन तुम्हारे बच्चों का भविष्य हमेशा तुम्हारा है। उसे किसी नेता के हवाले मत करो।

अब्दुल को अब समझना होगा - वो मोहरा नहीं, इस देश का नागरिक है। और उसकी असली ताकत वोट उसके हुनर और उसके बच्चों की तालीम में है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 3,2026 

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