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Wednesday, 18 February 2026

होर्मुज की आग: मिसाइलों के साथ परमाणु वार्ता – ईरान का दोहरा संदेश क्या है?

होर्मुज की आग: मिसाइलों के साथ परमाणु वार्ता – ईरान का दोहरा संदेश क्या है?
-Friday World 18th Feb 2026
जब जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम पर दूसरा दौर की अप्रत्यक्ष बातचीत शुरू हुई, ठीक उसी समय Strait of Hormuz में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने लाइव फायर ड्रिल चलाया। मिसाइलें दागी गईं, जलडमरूमध्य के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से बंद किया गया, और दुनिया की नजरें एक बार फिर खाड़ी की इस संकरी धमनी पर टिक गईं। ईरान का आधिकारिक दावा है कि यह नियमित सैन्य अभ्यास था, लेकिन टाइमिंग ने इसे कूटनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया। क्या यह सिर्फ एक संयोग था, या तेहरान ने जानबूझकर "बातचीत के साथ ताकत" का मिश्रित संदेश भेजा? 

 होर्मुज: दुनिया का सबसे खतरनाक 'तेल का रास्ता' 

Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शुमार है। यहां से गुजरने वाला तेल वैश्विक आपूर्ति का करीब 20-30% हिस्सा है। सऊदी अरब, यूएई, इराक और कुवैत जैसे देशों से एशिया, यूरोप और अमेरिका तक ऊर्जा पहुंचाने का मुख्य रास्ता यही है। अगर यहां तनाव बढ़े या इसे बंद किया जाए – भले ही कुछ घंटों के लिए – तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर इसका सीधा असर पड़ता है, जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत प्रभावित हो सकती हैं।

 ईरान इस रणनीतिक महत्व को अच्छी तरह समझता है। IRGC के नौसेना कमांडर रियर एडमिरल अलीरेजा तंगसीरी ने स्पष्ट कहा कि यदि उच्च नेतृत्व आदेश दे, तो जलडमरूमध्य को बंद किया जा सकता है। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने अमेरिकी युद्धपोतों को डुबोने की क्षमता वाली चेतावनी भी दोहराई। यह "गनबोट डिप्लोमेसी" का क्लासिक उदाहरण है – जहां बातचीत की मेज पर बैठते हुए सैन्य ताकत दिखाकर दबाव बनाया जाता है।

 वार्ता के बीच मिसाइलें: संकेत या संयोग? 

ईरान का कहना है कि "स्मार्ट कंट्रोल" नामक यह ड्रिल पहले से निर्धारित था, जिसमें मिसाइलें, ड्रोन और जहाज शामिल थे। लेकिन टाइमिंग संदेह पैदा करती है:

 - वार्ता जिनेवा में शुरू हुई। 

- उसी दौरान IRGC ने तट से, अंदरूनी इलाकों से और द्वीपों से मिसाइलें दागीं, जो होर्मुज में निशाने पर लगीं। 

- जलडमरूमध्य के हिस्सों को "सुरक्षा कारणों" से बंद किया गया।

 ईरान का संदेश साफ लगता है: "हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारी सैन्य क्षमता कमजोर नहीं हुई है। यदि दबाव बढ़ा, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।" यह डिटरेंस (रोकथाम) की रणनीति है – विरोधी को युद्ध की कीमत याद दिलाना, ताकि वह समझौते की ओर झुके। 

 परमाणु विवाद का मूल: विश्वास की कमी ईरान का परमाणु कार्यक्रम 2015 के JCPOA समझौते के बाद से विवादास्पद रहा। ट्रंप प्रशासन ने 2018 में अमेरिका को इससे बाहर निकाला, जिसके बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन बढ़ाया। अब बातचीत में मुख्य मुद्दे:

 - ईरान: प्रतिबंध हटाओ, शांतिपूर्ण ऊर्जा कार्यक्रम जारी रखने दो। 

- अमेरिका: यूरेनियम संवर्धन सीमित करो, मिसाइल कार्यक्रम पर भी चर्चा हो। 

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि "गाइडिंग प्रिंसिपल्स" पर समझ बनी है और "नई खिड़की खुली है"। लेकिन मूल मतभेद बरकरार हैं। ईरान मिसाइलों को अपनी रक्षा का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी (इजराइल, सऊदी) इन्हें खतरा देखते हैं। 

वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव 

- तेल बाजार: तनाव से ब्रेंट क्रूड में उछाल आ सकता है। भारत, चीन जैसे देशों को महंगा तेल मिलेगा।

 - क्षेत्रीय सुरक्षा: सऊदी, यूएई और इजराइल चिंतित हैं। अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सेना बढ़ाई है। 

- युद्ध का खतरा? फिलहाल नहीं, लेकिन यदि वार्ता विफल हुई और सैन्य गतिविधियां बढ़ीं, तो स्थिति बिगड़ सकती है। रूस-चीन के साथ ईरान के संयुक्त अभ्यास भी तनाव बढ़ाते हैं। 

कूटनीति या ताकत का खेल? ईरान का यह कदम "ड्यूल ट्रैक" रणनीति का हिस्सा लगता है – एक तरफ वार्ता, दूसरी तरफ शक्ति प्रदर्शन। यह दिखाता है कि मध्य-पूर्व में कूटनीति अकेली कभी काम नहीं करती; उसके साथ सैन्य बैकअप जरूरी है। अब सवाल यह है: क्या यह मिसाइल शो वार्ता को मजबूत बनाएगा, या ट्रंप प्रशासन को और सख्त रुख अपनाने पर मजबूर करेगा?

 वैश्विक शांति के लिए उम्मीद है कि जिनेवा की मेज पर समझ बनेगी, क्योंकि होर्मुज की आग अगर फैली, तो सिर्फ खाड़ी नहीं – पूरी दुनिया जल सकती है। 

Sajjadali Nayani ✍
Friday World 18th Feb 2026