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Tuesday, 17 March 2026

"ट्रंप को बड़ा झटका: ईरान युद्ध में सहयोगी ढूंढते अमेरिका को जर्मनी ने दिया साफ इनकार – "ये नाटो का युद्ध नहीं है!"

"ट्रंप को बड़ा झटका: ईरान युद्ध में सहयोगी ढूंढते अमेरिका को जर्मनी ने दिया साफ इनकार – "ये नाटो का युद्ध नहीं है!"-Friday World March 17,2026 
"ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल युद्ध में यूरोपीय साथी पीछे हटे: जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने कहा – 'बमबारी से नहीं, बातचीत से होगा समाधान'; 

ट्रंप की मित्र राष्ट्रों की अपील ठुकराई गई, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने में भी मदद से इनकार!"

मार्च 2026 का मध्य। मध्य पूर्व में आग भड़क रही है। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की है। ऑपरेशन के नाम से जाना जाने वाला ये हमला ईरान की परमाणु सुविधाओं, सैन्य ठिकानों और नेतृत्व पर केंद्रित है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे "ईरान की आक्रामकता का अंत" बताया है। लेकिन युद्ध अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा। ईरान ने जवाबी हमले तेज कर दिए हैं। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य – दुनिया के तेल का 20% से ज्यादा गुजरने वाला रास्ता – ईरानी हमलों से प्रभावित हो गया है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।

 ट्रंप ने इस संकट में सहयोगी देशों से मदद मांगी है। नाटो सहयोगियों से, खासकर यूरोपीय देशों से, उन्होंने अपील की कि वे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने में अमेरिकी नौसेना के साथ शामिल हों। ट्रंप ने चेतावनी भी दी – अगर सहयोगी मदद नहीं करेंगे, तो नाटो का भविष्य "बहुत बुरा" होगा। लेकिन जवाब मिला है ठंडा। जर्मनी ने सबसे सख्त रुख अपनाया है। 

जर्मनी का स्पष्ट इनकार जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने बर्लिन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा – "जर्मनी इस युद्ध में शामिल नहीं होगा।" उन्होंने कहा, "ये युद्ध नाटो का मामला नहीं है। नाटो के लिए ये युद्ध नहीं है।" मेर्ज़ ने सवाल उठाया – "क्या अमेरिका और इज़राइल ने इस सैन्य कार्रवाई शुरू करने से पहले हमारी सहमति ली थी? क्या संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ या नाटो से कोई मंजूरी ली गई?" जवाब में उन्होंने कहा – नहीं। इसलिए जर्मनी की सेना इसमें शामिल नहीं होगी। 

जर्मन सरकार के प्रवक्ता स्टीफन कोर्नेलियस ने और साफ किया – "जब तक युद्ध चल रहा है, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सैन्य रूप से सुरक्षित करने में भी कोई मदद नहीं दी जाएगी।" जर्मनी ने स्पष्ट कर दिया कि वो अमेरिकी मांग को मानने के मूड में नहीं है। यहां तक कि डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने भी कहा कि यूरोपीय नौसेनाओं से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। 

चांसलर मेर्ज़ का जोर: बातचीत पर, बमबारी नहीं 
मेर्ज़ ने बार-बार दोहराया कि किसी भी समस्या का हल बम गिराकर नहीं, बल्कि बातचीत से निकलता है। उन्होंने कहा – "सत्ता परिवर्तन सिर्फ हमलों से नहीं हो सकता।" जर्मनी चिंतित है कि युद्ध लंबा खिंचेगा। कोई स्पष्ट एग्जिट प्लान नहीं दिख रहा। अमेरिका और इज़राइल के पास "युद्ध को तेजी से और निर्णायक तरीके से खत्म करने की कोई संयुक्त योजना" नहीं है। मेर्ज़ ने चेतावनी दी – "ये खतरनाक वृद्धि है। लंबा युद्ध मध्य पूर्व और यूरोप दोनों के लिए हानिकारक होगा।"

 जर्मनी पहले भी नॉर्वे और कनाडा के नेताओं के साथ बैठक में यही मांग कर चुका है – युद्ध खत्म करने की ठोस रणनीति होनी चाहिए। 

अन्य यूरोपीय देशों का रुख** जर्मनी अकेला नहीं है। स्पेन और इटली ने भी दूरी बनाई है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने इसे "अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन" बताया और कहा – "बमों से समस्याएं हल नहीं होतीं।" इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने कूटनीति पर जोर दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि वो "बड़े युद्ध में खिंचे नहीं जाएंगे।" हालांकि ब्रिटेन और डेनमार्क अभी सोच-विचार में हैं। फ्रांस ने कुछ मदद की तैयारी दिखाई है, लेकिन वो भी सीमित है। 

कई यूरोपीय नेता मानते हैं कि ईरान का खतरा है, लेकिन ट्रंप की एकतरफा कार्रवाई और कोई प्लान न होने से वो सतर्क हैं। 

ट्रंप की निराशा और धमकी** ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा – "जो देश हॉर्मुज़ से सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं, उन्हें मदद करनी चाहिए।" उन्होंने जापान (95% तेल), चीन (90%) और दक्षिण कोरिया का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा – "अमेरिका को बहुत कम तेल वहां से मिलता है, लेकिन हम लड़ रहे हैं। सहयोगी मदद क्यों नहीं कर रहे?" उन्होंने नाटो पर हमला बोला – "अगर नकारात्मक जवाब मिला, तो नाटो का भविष्य बहुत बुरा होगा।" 

ट्रंप ने 7 देशों से मदद मांगी, लेकिन ज्यादातर ने मना कर दिया। यूरोपीय सहयोगी ट्रंप की धमकियों से नहीं डरे। वो कह रहे हैं – "ये हमारा युद्ध नहीं है।" 

क्यों है ये झटका बड़ा?** ट्रंप ईरान युद्ध में अकेले पड़ गए हैं। अमेरिका और इज़राइल के अलावा कोई बड़ा सहयोगी नहीं है। पहले के युद्धों में (जैसे इराक, अफगानिस्तान) नाटो साथ था। अब नहीं। यूरोप में युद्ध थकान है। यूक्रेन युद्ध चल रहा है। आर्थिक संकट है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी। यूरोपीय जनता युद्ध नहीं चाहती। 

ईरान के नए सुप्रीम लीडर ने हॉर्मुज़ बंद रखने की धमकी दी है। ये वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा कर सकता है। लेकिन यूरोप कह रहा है – पहले डिप्लोमेसी, फिर कोई फैसला। 

भारत और दुनिया पर असर** भारत जैसे देशों के लिए ये चिंता की बात है। खाड़ी से तेल आता है। भारतीय प्रवासी वहां फंसे हैं। युद्ध लंबा चला तो अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति अब यूरोप को अलग कर रही है। नाटो में दरार दिख रही है।

 ट्रंप को सहयोगी ढूंढने में मुश्किल हो रही है। जर्मनी का इनकार सबसे बड़ा झटका है। मेर्ज़ जैसे नेता कह रहे हैं – "बमबारी से नहीं, बातचीत से।" दुनिया देख रही है कि क्या ट्रंप पीछे हटते हैं या युद्ध और फैलाते हैं।

 ये घटनाक्रम बताता है – दोस्ती और गठबंधन आसान नहीं होते। जब जरूरत पड़ती है, तो साथी अपना हित देखते हैं। ट्रंप के लिए ये सबक है। दुनिया के लिए चेतावनी – युद्ध की आग कहीं भी फैल सकती है।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 17,2026