-Friday World 🌎 17 March, 2026
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के वरिष्ठ नेता और पूर्व स्पीकर अली लारिजानी ने एक तीखा पत्र जारी कर इस्लामी दुनिया की सरकारों को कड़ी नसीहत दी है। इस पत्र में उन्होंने सीधे-सीधे पूछा है – “आप किस तरफ़ खड़े हैं? ईरान के साथ या अमेरिका-इज़राइल के साथ?” लारिजानी ने लिखा है कि युद्ध के इस दौर में ईरान अकेला पड़ गया है, जबकि इस्लामी देशों की सरकारें चुप्पी साधे बैठी हैं या फिर ईरान के खिलाफ बयान दे रही हैं।
→ लारिजानी का पत्र: “कुछ गिने-चुने मामलों को छोड़कर किसी इस्लामी सरकार ने ईरान की मदद नहीं की” अली लारिजानी ने अपने पत्र में दुनिया के मुसलमानों और इस्लामी देशों की सरकारों को संबोधित करते हुए कहा:
“क्या आप जानते हैं कि इस युद्ध में ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बावजूद, कुछ गिने-चुने मामलों को छोड़कर किसी भी इस्लामी सरकार ने ईरानी जनता की कोई मदद नहीं की? बल्कि कई देशों ने तो यह तक कहा कि ईरान ने हमारे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है, इसलिए ईरान हमारा दुश्मन है।”
उन्होंने आगे तीखा सवाल उठाया: “क्या ईरान को यह मंज़ूर करना चाहिए कि आपके देशों में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों से ईरान पर हमला किया जाए? क्या यह इस्लामी एकता का मतलब है कि आप अमेरिकी बेस से हमला सहन करें, लेकिन ईरान का साथ न दें?”
लारिजानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“ईरान आपका मददगार है और आप पर हावी होने का कोई इरादा नहीं रखता। लेकिन आप किस तरफ़ हैं? क्या आप अमेरिका-इज़राइल के साथ हैं या इस्लामी उम्माह के साथ?”
→ अरब सरकारों का मौन, लेकिन जनता का जोरदार समर्थन ईरान के इस पत्र ने इस्लामी दुनिया में हलचल मचा दी है। सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, जॉर्डन और मिस्र जैसी अरब सरकारों ने अब तक ईरान के समर्थन में कोई बड़ा बयान नहीं दिया। कई देशों ने तो अमेरिका के साथ खड़े रहने का संकेत दिया है। लेकिन दूसरी तरफ, अरब देशों की जनता में ईरान के प्रति अभूतपूर्व समर्थन देखने को मिल रहा है।
सोशल मीडिया पर #IranStandsWithUmmah, #SupportIran, #BoycottUSBases जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। फिलिस्तीन, लेबनान, यमन, इराक और यहां तक कि सऊदी अरब, यूएई और मिस्र के युवा वर्ग में ईरान को “इस्लामी प्रतिरोध का प्रतीक” माना जा रहा है। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जहां लोग अमेरिकी बेस के खिलाफ नारे लगा रहे हैं और ईरान के साथ एकजुटता जता रहे हैं।
→ अरब सरकारों को सबसे बड़ा डर – जनता की बगावत ईरान के इस पत्र ने अरब सरकारों की सबसे बड़ी चिंता को उजागर कर दिया है – जनता का गुस्सा। अगर जनता सड़कों पर उतर आई और अमेरिकी ठिकानों के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गए, तो सत्ता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यही वजह है कि अरब सरकारें चुप हैं। वे ईरान का साथ देने से डर रही हैं क्योंकि इससे अमेरिका नाराज हो सकता है, लेकिन जनता का विरोध भी नहीं सहन कर सकतीं।
ईरान का यह पत्र एक तरह से अरब सरकारों को चुनौती दे रहा है: “अगर आप अमेरिकी बेस पर हमला होने पर चुप रहेंगे, तो जनता आपको कभी माफ नहीं करेगी। और अगर जनता ने सत्ता पलट दी, तो फिर आपके पास कुछ नहीं बचेगा।”
→ ईरान की रणनीति: जनता को साथ लेकर सरकारों पर दबाव ईरान ने इस युद्ध में दोहरी रणनीति अपनाई है। एक तरफ वह अमेरिका-इज़राइल पर सैन्य हमले कर रहा है, दूसरी तरफ दुनिया भर के मुसलमानों और खासकर अरब जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। लारिजानी का यह पत्र इसी रणनीति का हिस्सा है। ईरान जानता है कि अगर अरब की सड़कों पर जनता उसके साथ खड़ी हो गई, तो अरब सरकारों पर दबाव बढ़ेगा और वे मजबूरन ईरान का साथ दे सकती हैं या कम से कम तटस्थ रह सकती हैं।
→ वैश्विक असर और भविष्य की आशंका यह पत्र सिर्फ एक बयान नहीं है – यह इस्लामी दुनिया में एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। अगर अरब जनता का समर्थन ईरान के साथ मजबूत हुआ, तो मध्य पूर्व की राजनीति पूरी तरह बदल सकती है। दूसरी तरफ, अगर अरब सरकारें अमेरिका के साथ खड़ी रहीं, तो जनता में गुस्सा और बढ़ेगा, जो भविष्य में बड़े विद्रोह का रूप ले सकता है।
ईरान ने साफ संदेश दिया है:
“हम अकेले लड़ रहे हैं, लेकिन हम उम्माह के लिए लड़ रहे हैं। अब आप तय करें – आप किस तरफ़ हैं?”
यह युद्ध अब सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन का नहीं रहा – यह दिलों और विचारों का भी युद्ध बन गया है। लारिजानी का पत्र इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो आने वाले दिनों में इस्लामी दुनिया की दिशा तय कर सकता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 🌎 17 March, 2026